
क्या भारत से बैर की साझा जमीन साथ लाएगी बांग्लादेश और पाकिस्तान को, चीन क्यों डाल रहा खाद-पानी?
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हाल में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान ने एक बड़ा बयान दिया, जिसके मुताबिक पाकिस्तान, बांग्लादेश और चीन का मिलना देश के लिए रणनीतिक चुनौती बन सकता है. लेकिन क्या वाकई तीनों देश एक साथ आ सकते हैं, या कोई अदृश्य दीवार है, जो इन्हें एक होने से रोके रखेगी?
इन दिनों भारत के कई पड़ोसियों से संबंध खराब चल रहे हैं. पाकिस्तान से तनाव तो सदाबहार था ही, शेख हसीना के तख्तापलट के बाद बांग्लादेश भी भड़कने लगा. चीन इन दोनों से एक कदम आगे है. वैसे तो पाकिस्तान और चीन ऑल-वेदर दोस्त होने का दावा करते थे, लेकिन धीरे-से इस दायरे में ढाका भी आ रहा है. इसी गठजोड़ पर चीफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने चेताया कि ऐसा हुआ तो देश पर भारी असर होगा. लेकिन दुश्मनी निभाने के लिए हुई दोस्ती आखिर कितनी टिकाऊ होगी और ये दोस्ती हो भी पाएगी या नहीं!
अक्सर कहा जाता है, तीन तिगाड़ा- काम बिगाड़ा. तीन लोग या तीन विचार जहां भी मिलते हैं, कुछ न कुछ गड़बड़ हो जाती है. यही बात देशों के मामले में भी लागू होती है. चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश इन दिनों भारत के खिलाफ मोर्चाबंदी में जुटे हैं. इसके लिए जरूरी है कि तीनों ही एक जमीन पर हों, लेकिन इसमें कुछ न कुछ कमी पड़ रही है, जो कि देश के पक्ष में ही है.
पाकिस्तान और बांग्लादेश, यही वो रिश्ता है जो तिकड़ी को सबसे कमजोर बनाता है. सत्तर के दशक में भाषा को लेकर पाकिस्तान ने बांग्लादेश (तब पूर्वी पाकिस्तान) पर भारी हिंसा की. नरसंहार के बीच बहुत से लोग पलायन कर गए. इसके बाद भारत की मदद से बांग्लादेश बन सका. वो हिंसा आज भी इन दोनों देशों के बीच गहरी खाई बनाए हुए है.
साल 1971 में आजाद बांग्लादेश में भी पाक से सहानुभूति रखने वालों को सजाएं मिलीं. वहां की सरकार ने वॉर क्राइम के लिए फांसी तक दे दी. आज भी वहां आम लोग पाकिस्तान से मेलजोल नहीं रखते. यहां तक कि पाकिस्तान से जुड़ी पार्टी इस्लाम-ए-जमाती भी उतना आगे नहीं आ सकी.
पाकिस्तान में भी ढाका को लेकर कभी उदारता नहीं दिखी. इस्लामाबाद ने आज तक ढाका से उस नरसंहार के लिए सार्वजनिक रूप से माफी नहीं मांगी. यहां तक कि उसे देश का दर्जा भी तीन साल बाद दिया. दशकों बाद भी बैर कम नहीं हुआ. कुछ साल पहले ढाका कैफे अटैक में पाकिस्तानी एजेंटों का इनवॉल्वमेंट सुनाई पड़ा था, जिसके बाद दोनों के डिप्लोमेटिक रिश्ते फिर दरके थे. ये अब तक चला आ रहा है. दोनों में रिश्ता तो है लेकिन बातचीत सीमित है.
इधर चीन दोनों देशों में कॉमन है. वो खुद को पाकिस्तान का ऑल वेदर फ्रेंड बताता रहा. पाकिस्तान भी अपनी नीतियों में ऐसे बदलाव करता है, जो चीन के लिए सही रहें. पाक को खुश रखने में वो यहां तक चला गया कि भीतरखाने ही बगावत होने लगी. बलूचिस्तान के लोग नाराज हैं कि चीन की शह पर उनके यहां का नेचुरल रिसोर्स इस्तेमाल हो रहा है. बलूच लगातार चीनी अधिकारियों पर हमले कर रहे हैं ताकि पाकिस्तान घबराकर रुक जाए. हालांकि ऐसा हुआ नहीं. वैसे दोनों देशों का रिश्ता पूरी तरह ऑर्गेनिक नहीं, बल्कि भारत-विरोधी एजेंडा पर टिका हुआ है.

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