
कैसे चिराग और उद्धव जैसा बनने से बच गए नीतीश, पढ़ें बिहार की सियासी जंग की Inside Story
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देश की सत्ता में बीजेपी भले ही आठ सालों से काबिज हो, लेकिन बिहार में अभी तक अपना मुख्यमंत्री नहीं बना सकी. महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे के जरिए उद्धव ठाकरे का तख्तापलट कर बीजेपी सत्ता में भागीदार बन गई है. ऐसी ही बिहार में भी सत्ता के सिंहासन पर काबिज होने की कवायद की जा रही थी, जिसके सूत्रधार आरसीपी सिंह को माना जा रहा था. लेकिन, मंजे हुए नीतीश कुमार ने ऐसी सियासी पलटी मारी की सारे के सारे प्लान धरे के धरे रह गए?
बिहार की सियासत में भी महाराष्ट्र जैसी सियासी पठकथा लिखी जा रही थी. महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के पैरों तले से सत्ता की जमीन उनकी ही पार्टी के एकनाथ शिंदे ने खिसका कर खेल कर दिया. बिहार में आरसीपी सिंह के बहाने 'शिंदे मॉडल' की इबारत लिखी जा रही थी, लेकिन मंजे नेता नीतीश कुमार ने बेहद सधे अंदाज में ऐसी तैयारी कर ली थी कि जेडीयू का सियासी हश्र शिवसेना जैसा न हो.
नीतीश कुमार ने एक तरफ बीजेपी शीर्ष नेतृत्व का भरोसा बनाए रखा और दूसरी तरफ आरजेडी के साथ मिलकर सरकार बनाने का तानाबाना बुन रहे थे. नीतीश ने पहले बागी आरसपी सिंह के पर कतर कर उन्हें पूरी तरह से पैदल कर दिया और फिर बीजेपी को उसी की भाषा में मात देने की प्लानिंग की. इस तरह चिराग पासवान और उद्धव ठाकरे जैसा बनने से नीतीश कुमार बाल-बाल बच गए?
नीतीश ने कैसे दी सियासी मात
लालू प्रसाद यादव के कथित 'जंगलराज' वाले भय के माहौल के बीच विकास करने वाले नेता के तौर पर उभरे नीतीश कुमार जमीनी संघर्घ और मंडल की राजनीति से आए हैं. ऐसे में बीजेपी के साथ नीतीश कुमार मिलकर सरकार चला रहे थे, लेकिन बीजेपी के हर कदम पर नजर भी बनाए हुए थे. इसकी वजह यह थी कि साल 2020 से ही बिहार भाजपा नेताओं के मन में यह कसमसाहट बनी हुई थी कि उनके खाते में ज्यादा सीटें होने के बाद भी उन्हें नीतीश कुमार का दबाव झेलना पड़ रहा है और नीतीश की अगुवाई में सरकार चलानी पड़ रही है.
बीजेपी नेता चाहते थे कि अब राज्य में उनका मुख्यमंत्री होना चाहिए, लेकिन पार्टी के केंद्रीय नेताओं के इशारे पर चुप्पी साधे रखी गई. हालांकि, धीरे-धीरे यह आवाज बड़ी नाराजगी में तब्दील होती गई. समय-समय पर जेडीयू-बीजेपी नेताओं के बीच का मनमुटाव बढ़ता गया और यह बिहार विधानसभा के पटल पर भी देखा गया. इसी नाराजगी के बीच महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे प्रकरण के बाद बिहार बीजेपी के नेताओं को लग रहा था कि यदि शिवसेना की तर्ज पर जेडीयू में तोड़फोड़ करने में कामयाब हो जाते हैं तो वे बिहार की बाजी पलट सकते हैं.
आरसीपी में शिंदे तलाश रही थी बीजेपी

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