
'सेकुलर पार्टियों' के लिए कितने काम के रह गए हैं आजम खान और नसीमुद्दीन जैसे नेता
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देश की राजनीति में असदुद्दीन ओवैसी को छोड़कर मुस्लिम नेताओं के प्रभाव और उनकी प्रासंगिकता सवालों के घेरे में आ चुकी है. उत्तर प्रदेश में आजम खान और नसीमुद्दीन सिद्दीकी जैसे नेताओं का प्रभाव काफी कम हो गया है - पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले हुमायूं कबीर को टीएमसी से निकाला जाना भी एक उदाहरण है.
क्या देश में मुस्लिम राजनीति के अच्छे दिन जा चुके हैं? राष्ट्रीय स्तर पर तो ऐसा ही लगता है, क्षेत्रीय राजनीति थोड़ी अलग जरूर है. एक दौर था जब वोट किसे देना है, उसके लिए फतवा जारी होता था. फतवा भी किसी पार्टी विशेष के लिए मुस्लिम समुदाय में खास दखल रखने वाले नेता की बदौलत ही मुमकिन हो पाता था.
बिहार विधानसभा चुनाव के बाद पश्चिम बंगाल चुनाव में भी मुस्लिम वोट का प्रभाव साफ देखा जा रहा है. पश्चिम बंगाल मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तरह समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश यादव भी उत्तर प्रदेश में 2027 के लिए वैसी ही तैयारी कर रहे हैं. अखिलेश यादव के पीडीए में ए तो मुस्लिम वोटर के लिए ही है.
तमाम चुनौतियों से जूझते रहने के बावजूद ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल चुनाव में सबसे ज्यादा भरोसा मुस्लिम वोटर पर ही है. पश्चिम बंगाल में करीब 85 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम आबादी निर्णायक भूमिका में है. हालांकि, तृणमूल कांग्रेस ने 291 विधानसभा सीटों में से सिर्फ 47 पर मुस्लिम नेताओं को टिकट दिया है.
चुनावों से पहले बाबरी मस्जिद के बहाने हुमायूं कबीर ने बंगाल में मुस्लिम राजनीति के लिए माहौल बनाने की कोशिश जरूर की, लेकिन अब तो मामला ठंडा ही लग रहा है. बंगाल में मुस्लिम वोट पाने के लिए हुमायूं कबीर को पहले असदुद्दीन ओवैसी बनना होगा. वैसे असदुद्दीन ओवैसी भी 2021 के बंगाल चुनाव में फेल रहे. बिहार चुनाव में तो 2020 की तरह असदुद्दीन ओवैसी 2025 में भी सफल रहे हैं.
उत्तर प्रदेश की समाजवादी राजनीति में आजम खान का दबदबा धीरे धीरे कम होने के बाद, कांग्रेस से अखिलेश यादव के साथ आए नसीमुद्दीन सिद्दीकी खासे एक्टिव नजर आ रहे हैं - सवाल यह है कि क्या धर्म निरपेक्षता की राजनीति करने वाली पार्टियों के लिए ऐसे नेताओं की अहमियत बची है?
मुस्लिम वोटर पर नेताओं का कितना प्रभाव

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