
कभी तौकीर रजा जैसों से खौफ खाती थी पुलिस, योगी मॉडल में अब खैर नहीं
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'आई लव मुहम्मद' के नाम पर निकाले जा रहे जुलूस का खमियाजा आम लोगों को न भुगतना पड़े इसके लिए सभी सरकारों को सोचना चाहिए. यह सर्वविदित तथ्य है कि दंगाई नेताओं के झांसे में आकर आम लोग हिंसक हो जाते हैं. नेता तो किनारे हो जाते हैं और आम लोगों को जेल का चक्कर काटना पड़ता है. मौलाना तौकीर रजा जैसे लोगों पर सख्त कार्रवाई से आम लोगों को परेशान होने से बचाया जा सकता है.
कानपुर में ईद-ए-मिलाद-उन-नबी की शोभायात्रा के दौरान लगी 'आई लव मुहम्मद' की आग बरेली, उन्नाव, लखनऊ, महाराजगंज, कौशांबी, काशीपुर, हैदराबाद, नागपुर और गुजरात के गांधीनगर के बाद सोमवार को अहिल्यानगर (महाराष्ट्र) पहुंच चुकी है. जाहिर है कि पूरे देश की हवा खराब हो, इसके पहले शासन-प्रशासन को सख्ती दिखाना होगा. भारत जैसे बहुलवादी लोकतंत्र में धार्मिक भावनाओं का सम्मान हर नागरिक का अधिकार है, लेकिन जब 'आई लव मुहम्मद' जैसे नारे शांति के बजाय हिंसा का पर्याय बन जाते हैं, तो सवाल उठना स्वभाविक हो जाता है. जाहिर है कि यह भी सवाल उठता है कि क्या यह आंदोलन प्रेम की अभिव्यक्ति है या साजिश का मुखौटा है?
तौकीर रजा खान जैसे कट्टरपंथी मौलानाओं ने इसे एक हथियार बना लिया, जिसके परिणामस्वरूप बरेली में 26 सितंबर को शुक्रवार की नमाज के बाद हिंसक झड़पें हुईं थीं. इसी तरह उत्तर दक्षिण तक बहुत से मौलाना ऐसे हैं जो आम लोगों को बरगलाकर उन्हें अपराधी बना रहे हैं. बरेली में पथराव, लाठीचार्ज, 10 पुलिसकर्मियों की चोटें आईं थीं और दर्जनों गिरफ्तारियां भी हुईं. जाहिर है कि आम मुसलमान जो शांतिपूर्ण जीवन जीना चाहते हैं के बजाय तौकीर रजा जैसे नेताओं पर सख्ती जरूरी है. ये वे लोग हैं जो धार्मिक भावनाओं का दुरुपयोग कर सामाजिक सद्भाव को तोड़ने का काम करते हैं.
1-तौकीर रजा खान जैसे लोगों पर अब तक एक्शन होता ही नहीं था
तौकीर रजा खान, इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल (आईएमसी) के प्रमुख और बरेली के एक प्रमुख मौलाना, लंबे समय से विवादों के केंद्र में रहे हैं. उनका इतिहास कट्टरवाद और राजनीतिक उकसावे से भरा पड़ा है. 2007 में बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन के खिलाफ उन्होंने 5 लाख रुपये का इनाम घोषित किया था. यह फतवा न केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला था, बल्कि धार्मिक अतिवाद का खुला प्रदर्शन. 2009 और 2012 के लोकसभा चुनावों में उन्होंने मुसलमानों को धर्म के नाम पर वोट डालने के लिए उकसाया, जो संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ था. लेकिन 2025 का 'आई लव मुहम्मद' विवाद उनके करियर का सबसे खतरनाक अध्याय साबित हुआ. यूपी में पूर्व मुख्यमंत्री मायावती और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के राज में उन्हें सरकार का संरक्षण मिल जाता था. अखिलेश यादव की सरकार में तो उन्हें राज्यमंत्री का दर्जा भी मिला हुआ था.
तौकीर रजा के जहरीले भाषण ने 15 साल पहले भी बरेली शहर के अमन-चैन को आग लगाई थी. तब शहर में एक महीने तक कर्फ्यू लगा था. तत्कालीन बसपा सरकार ने रजा को गिरफ्तार भी किया था, लेकिन दो दिन बाद ही उसको रिहा करना पड़ा. इसके बाद शासन ने एसएसपी को हटा दिया था. बरेली के जिस बाजार में बारावफात के जुलूस के बाद दंगा-फसाद हुआ था वहां कई इलाकों में तोड़फोड़ आगजनी हुई थी. करीब 30 दुकानों को निशाना बनाया गया. बड़ी बात यह रही कि सभी दुकानें चिन्हित कर जलाई गई थीं. हिंदू व्यापारियों को निशाना बनाया गया था.
पर अब यूपी में योगी की सरकार है. पुलिस ने कानपुर वाली घटना के आरोप में 9 सितंबर को 24 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की, लेकिन तौकीर राजा ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला बताते हुए वीडियो जारी किया. उन्होंने बरेली में 26 सितंबर को शुक्रवार की नमाज के बाद इस्लामिया ग्राउंड पर प्रदर्शन का आह्वान किया. प्रशासन के अनुमति नहीं देने पर समर्थकों ने आला हजरत दरगाह और उनके घर के बाहर जमा होकर 'आई लव मुहम्मद' के प्लेकार्ड लिए नारे लगाए.

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