
कबायली आक्रमण से लेकर पहलगाम हमले तक... जानें 78 सालों में कश्मीर को मिले कितने जख्म
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जम्मू कश्मीर में 78 साल पहले एक कबायली हमला हुआ था, जो एक साल दो महीने, एक हफ्ता और तीन दिन बाद खत्म हुआ. इस हमले ने कश्मीर की सूरत बदल कर रख दी थी. इसी हमले ने जमीन की जन्नत को जहन्नम बनने की बुनियाद रखी.
The Kashmir War History: करीब आठ दशकों से पाकिस्तान अपने नापाक मंसूबों को पूरा करने की खातिर भारत को लहूलुहान करता रहा है. खासकर कश्मीर को. पाकिस्तान की इसी नापाक करतूत की वजह से कभी सरहद पर सुकून नहीं रहा. अब उसी पाकिस्तान ने सबसे ताजा जख्म पहलगाम की सूरत में दिया है. वही पहलगाम जो कश्मीर में है और वही कश्मीर जो हमेशा पाकिस्तान की आंखों में खटकता रहा है. चलिए जानते हैं कश्मीर के जख्मों की पूरी कहानी.
जम्मू कश्मीर में 78 साल पहले एक कबायली हमला हुआ था, जो एक साल दो महीने, एक हफ्ता और तीन दिन बाद खत्म हुआ. इस हमले ने कश्मीर की सूरत बदल कर रख दी थी. इसी हमले ने जमीन की जन्नत को जहन्नम बनने की बुनियाद रखी. और उसी हमले ने पहली बार मुजाहिदीन को पैदा किया, जिसने कश्मीर की एक नई कहानी लिख डाली.
करीब 700 साल पहले जिस गुलिस्तान को शम्सुद्दीन शाह मीर ने सींचा था, उनके बाद तमाम नवाबों और राजाओं ने जिसको सजाया-संवारा, जिसकी आस्तानों और फिजाओं में चिनार और गुलदार की खुशबू तैरती थी, जिसे आगे चलकर जमीन के जन्नत का खिताब मिला- वही कश्मीर. उसी कश्मीर में आज से ठीक 70 साल पहले एक राजा की नादानी और एक हुक्मरान की मनमानी ने फिजाओं में बारूद का ऐसा ज़हर घोला, जिसका गंध आज भी कश्मीर में महसूस किया जा सकता है.
'मेरा मुल्क... तेरा मुल्क... मेरा मज़हब... तेरा मज़हब... मेरी ज़मीन तेरी ज़मीन... मेरे लोग तेरे लोग.' इस गैर इंसानी ज़िद ने पहले तो एक हंसते-खिलखिलाते मुल्क के दो टुकड़े कर दिए. लाखों लोगों को मज़हब के नाम पर मार डाला गया और फिर उस जन्नत को भी जहन्नम बना दिया गया, जिसके राजा ने बड़ी उम्मीदों के साथ अंग्रेजों से अपनी रियासत को हिंदू-मुस्लिम की सियासत से दूर रखने की गुजारिश की थी. मगर उनकी रियासत की सरहदों के नज़दीक बैठे मुसलमानों के लिए पाकिस्तान बनाने वाले कायदे आज़म मोहम्मद अली जिन्नाह कश्मीर की इस आज़ादी के लिए तैयार नहीं थे.
उनकी दलील थी कि जिस तरह गुजरात के जूनागढ़ में हिंदू आबादी के आधार पर उसे भारत में मिलाया गया, उसी तरह कश्मीर में मुस्लिम आबादी के हिसाब से उस पर पाकिस्तान का हक है. अपनी इसी ज़िद को मनवाने के लिए जिन्नाह ने कश्मीर के महाराजा हरि सिंह पर दबाव बनाना शुरू कर दिया और कश्मीर को जाने वाली तमाम ज़रूरी चीज़ों की सप्लाई बंद कर दी. पाकिस्तान अब कश्मीर को अपने साथ मिलाने के लिए ताक़त का इस्तेमाल करने लगा. मगर महाराजा हरि सिंह अब भी अपने फैसले पर कायम थे- आज़ाद कश्मीर
22 अक्टूबर 1947 आज़ादी मिलने के महज 9 हफ्ते बाद, जिन्नाह के इशारे पर पाकिस्तान की तरफ से हज़ारों कबायली कश्मीर में घुस आए. उन्होंने लूटपाट, हत्या, बलात्कार और तबाही मचाई. उनके हाथों में बंदूकें, मशीन गनें और मोर्टार थे. उन्हें मुजाहिदीन का खिताब दिया गया था. इन आतंकियों ने मुज़फ्फराबाद और डोमेल जैसे शहरों पर कब्ज़ा कर लिया और श्रीनगर के करीब उरी तक पहुंच गए.

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