
एकनाथ शिंदे के मुख्यमंत्री बनने या न बनने से उद्धव ठाकरे की राजनीतिक सेहत पर सीधा फर्क पड़ेगा | Opinion
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उद्धव ठाकरे की राजनीति को करीब करीब खत्म माना जाने लगा है, सिर्फ बीएमसी चुनावों से ही थोड़ी बहुत उम्मीद बची है - अब देखना ये है कि एकनाथ शिंदे की आगे की पारी का क्या प्रभाव पड़ता है?
उद्धव ठाकरे का एकनाथ शिंदे के प्रति आक्रामक होना स्वाभाविक है. सरेआम ‘गद्दार’ कहा जाना निश्चित तौर पर एकनाथ शिंदे के समर्थकों को अच्छा नहीं लगता होगा. उद्धव ठाकरे के समर्थकों को ऐसी बातें सुनकर भले ही थोड़ा सुकून मिलता हो, लेकिन कुल मिलाकर तो नुकसानदेह ही साबित हुआ.
अब तो ये भी कहा जा सकता है कि महाराष्ट्र के लोगों ने ‘गद्दार’ को ही शिवसेना का असली हकदार मान लिया है. चुनावों के दौरान उद्धव ठाकरे एक बात बार बार दोहराते रहते थे कि इस बार असली और नकली शिवसेना का फैसला जनता कर देगी - और जनता ने कर दिया है. लोकसभा चुनाव में जनता का जो मूड था, वो विधानसभा चुनाव में पूरी तरह बदल चुका था.
ऐसे भी समझ सकते हैं कि महाराष्ट्र की जनता ने उद्धव ठाकरे वाली जगह एकनाथ शिंदे को सौंप दी है, उसी उम्मीद के साथ कि जिस बात के लिए लोग शिवसेना की पर भरोसा करते थे, वो शिवसेना जारी रखेगी.
और एकनाथ शिंदे का जनता की उम्मीदों पर खरा उतर पाना इस बात पर भी निर्भर करता है कि वो आगे भी महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने रहते हैं या नहीं - और ये बात उद्धव ठाकरे की राजनीति के लिए भी बहुत ज्यादा मायने रखती है.
एकनाथ शिंदे के मुख्यमंत्री बनने के फायदे और नुकसान
शिवसेना में उद्धव ठाकरे के खिलाफ बगावत के बाद बंटवारा भर हुआ था. पहले विधानसभा, फिर चुनाव आयोग में और बाद में सुप्रीम कोर्ट में भी एकनाथ शिंदे का ही पक्ष भारी रहा, लेकिन अभी अंतिम फैसला नहीं आया है. पार्टी का का नाम और चुनाव निशान फिलहाल एकनाथ शिंदे के पास ही है.

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