
उद्धव और राज की जुगलबंदी एक-दूसरे को पॉलिटिकली क्या-क्या दे सकती है? 5 Points में समझें
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शिवसेना (यूबीटी) के प्रमुख उद्धव ठाकरे के 65वें जन्मदिन पर मनसे के अध्यक्ष राज ठाकरे ने मातोश्री पहुंचकर मुबारकबाद दिया. 2024 के विधानसभा चुनाव के बाद से उद्धव और राज ठाकरे के बीच सियासी जुगलबंदी दिख रही है, जिसके बाद सवाल उठने लगा है कि दोनों भाइयों की एकता किसके लिए कितनी मुफीद होगी?
महाराष्ट्र की सियासत में ठाकरे बंधुओं की पॉलिटिक्स लगातार चर्चा के केंद्र में बनी हुई है. कभी उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के साथ आने के बात कही जाती है तो कभी उद्धव की बीजेपी के प्रति झुकाव दिखता है. इन कयासों के बीच मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने 'मातोश्री' जाकर शिवसेना (यूबीटी) के अध्यक्ष उद्धव ठाकरे को जन्मदिन की बधाई दी. उद्धव ठाकरे के 65वां जन्मदिन पर राज ठाकरे का मातोश्री पहुंचना और उन्हें गले लगाकर बधाई देने के सियासी मायने तलाशे जाने लगे हैं.
'मातोश्री' सिर्फ उद्धव ठाकरे का घर ही नहीं बल्कि ठाकरे परिवार और शिवसेना की राजनीति का प्रतीक माना जाता है. ऐसे में राज ठाकरे करीब छह साल के बाद 'मातोश्री' पहुंचे थे. राज ठाकरे मातोश्री जाना केवल परिवारिक एकता का प्रतीक है, बल्कि बाला साहेब ठाकरे की सियासी विरासत को दोबारा से जीवंत करने का प्रयास माना जा रहा है.
ठाकरे बंधुओं की मुलाकात सिर्फ ठाकरे परिवार का पुनर्मिलन ही नहीं बल्कि महाराष्ट्र की राजनीति में बदलाव के भी संकेत माने जा रहे हैं. उद्धव-राज के बीच इन दिनों जिस तरह से सियासी जुगलबंदी दिख रही है, उससे लगातार यह सवाल उठ रहे हैं कि उद्धव और राज ठाकरे एक साथ आते हैं तो एक दूसरे के लिए राजनीतिक रूप से कितने मुफीद होंगे?
उद्धव-राज ठाकरे कितने दूर, कितने करीब शिवसेना के संस्थापक बाला साहेब ठाकरे की उंगली पकड़कर भतीजे राज ठाकरे और बेटे उद्धव ठाकरे राजनीति में कदम रखा. एक समय राज ठाकरे को बाला साहेब का सियासी उत्तराधिकारी माना जाता था, लेकिन जब उन्होंने अपने राजनीतिक वारिस के तौर पर उद्धव ठाकरे को आगे बढ़ाया तो राज ने 2005 में खुद को शिवसेना से किनारे कर लिया और 2006 में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के नाम से अपनी पार्टी की स्थापना किया. इसके बाद से उद्धव और राज के सियासी रास्ते अलग हो गए थे.
2024 के विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ा झटका 'ठाकरे ब्रांड' को लगा है. राज ठाकरे खाता नहीं खोल सके और उद्धव ठाकरे को एकनाथ शिंदे ने मात देकर शिवसेना की राजनीति पर अपना कब्जा जमा लिया. इसके बाद से ठाकरे बंधुओं के रिश्तों में जमी बर्फ पिघलने लगी. उद्धव और राज एक दूसरे से मिलने लगे. सात महीने में सात बार दोनों नेताओं की किसी न किसी बहाने मुलाकात होती रही और एकता के सियासी संदेश भी देने लगे.
मराठी अस्मिता और हिंदी विरोध को लेकर दो दशक के बाद पांच जुलाई को उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे एक साथ आए थे. उस वक्त उद्धव ठाकरे ने ऐलान कर दिया था कि साथ आए हैं, साथ रहने के लिए. इस के बाद ही दोनों के बीच राजनीतिक जुगलबंदी दिख रही, लेकिन उद्धव ठाकरे के जन्मदिन पर राज ठाकरे मातोश्री जाकर बधाई देना सामान्य नहीं. राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे बीएमसी चुनाव से पहले हाथ मिलाते हैं तो महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है.

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