
ईरान संकट से भारत पर पहली आर्थिक चोट, 4 लाख टन बासमती चावल अटका... पेमेंट भी फंसा!
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ईरान पर हमले के बाद अब भारत के साथ मिडिल ईस्ट का व्यापार संकट गहराने लगा है. करीब 4,00,000 मैट्रिक टन बासमती चावल या तो बंदरगाहों पर अटका है या रास्ते में फंसा हुआ है. इससे निर्यात पूरी तरह रुक गया है और नए व्यापार सौदे भी लगभग ठप हो गए हैं.
ईरान, इजराइल और अमेरिका में टकराव के कारण मध्य पूर्व (Middle East) के कई देश इन दिनों जंग की आग में झुलस रहे हैं. इसकी वजह से भारतीय बासमती के एक्सपोर्ट पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं. भारत अपने कुल बासमती एक्सपोर्ट का करीब 72 फीसदी मिडिल ईस्ट के देशों में भेजता है. इसलिए बासमती निर्यातकों से लेकर उसे उगाने वाले किसान तक...सब टेंशन में हैं. अगर युद्ध लंबा खिंचा तो एक्सपोर्ट बुरी तरह से प्रभावित होगा और उसकी कीमत आखिरकार भारतीय किसानों को भी चुकानी पड़ेगी. युद्ध की वजह से सैकड़ों करोड़ रुपये के चावल की खेप बंदरगाहों पर फंसी गई है. साथ ही करोड़ों रुपये की पेमेंट भी अटक गई है. इससे निर्यातकों की टेंशन बढ़ गई है.
पंजाब बासमती राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन (PBREA) के डायरेक्टर अशोक सेठी का कहना है कि मिडिल ईस्ट के देशों में बिरियानी की वजह से सबसे ज्यादा बासमती का निर्यात होता है. यही क्षेत्र भारतीय बासमती का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय बाजार है. इस क्षेत्र में युद्ध चल रहा है, इसलिए पूरा बासमती बिजनेस संकट में फंस गया है. अधिकांश माल उधार पर जाता है, यही कारण है कि लोगों का पैसा भी फंसा हुआ है. एक्सपोर्ट क्रेडिट गारंटी कारपोरेशन के माध्यम से केंद्र सरकार पेमेंट की गारंटी दिलवाए. एक्सपोर्ट बंद होगा या कम होगा, दोनों सूरत में किसानों को नुकसान होगा. क्योंकि इससे दाम गिरेगा जिसका सीधा असर किसानों की इनकम पर पड़ेगा. भुगतान मिलने में दिक्कत होने की वजह से कुछ सौदे भी रद्द होने का डर है.
दरअसल, मिडिल-ईस्ट में संघर्ष के कारण करीब 4,00,000 मैट्रिक टन बासमती चावल या तो बंदरगाहों पर अटका है या रास्ते में फंसा हुआ है. इससे निर्यात पूरी तरह रुक गया है और नए व्यापार सौदे भी लगभग ठप हो गए हैं. इसके पीछे सबसे बड़ी समस्या समुद्री मार्गों में बाधा, जिससे जहाजों को गोदामों और बंदरगाहों से आगे नहीं भेजा जा पा रहा है. इसी वजह से कंटेनर और जहाज किराया दोगुना से भी ज्यादा हो गया है और बीमा कंपनियां भी युद्ध-संयुक्त क्षेत्रों में जहाजों का इंश्योरेंस देना बंद कर रही हैं.
आंकड़ों के मुताबिक करीब 200,000 टन चावल ट्रांजिट में है और करीब 200,000 टन बंदरगाहों पर रुके हुए हैं. निर्यातक इन भेजे हुए माल को आगे नहीं पहुंचा पा रहे हैं, क्योंकि जहाज और कंटेनर उपलब्ध नहीं हैं और बीमा संबंधी जोखिम बहुत बढ़ गया है. यह समस्या 'Strait of Hormuz' जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर तनाव और अस्थिरता के कारण उत्पन्न हुई है.
भारतीय बासमती के मुरीद देश भारत ने साल 2024-25 में 60,65,483 मीट्रिक टन बासमती चावल का एक्सपोर्ट किया, जिससे देश को 50,312 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा प्राप्त हुई. जिसमें से 36,139 करोड़ रुपये सिर्फ मिडिल ईस्ट के देशों से मिले हैं. ऐसे में यह क्षेत्र भारत के कृषि कारोबार के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है. भारतीय बासमती के पांच सबसे बड़े खरीदार इसी क्षेत्र के हैं. इनमें सऊदी अरब, इराक, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और यमन शामिल हैं. इन पांच देशों में भारत के कुल बासमती एक्सपोर्ट का 67 फीसदी हिस्सा जाता है. खास बात यह है कि मुस्लिम देश होने के बावजूद ये सब पाकिस्तान की बजाय भारतीय बासमती को तवज्जो देते हैं. भारत के अलावा पाकिस्तान ही दूसरा ऐसा देश है जहां बासमती चावल पैदा होता है.
भारत से ईरान में कृषि निर्यात डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ कमर्शियल इंटेलिजेंस एंड स्टेटिस्टिक्स (DGCIS) के मुताबिक सऊदी अरब भारत से सबसे ज्यादा बासमती चावल मंगाता है. साल 2024-25 में इसने 10,191 करोड़ रुपये का भारतीय बासमती चावल आयात किया. जहां तक ईरान की बात है तो इसने 8,897 करोड़ रुपये के कृषि उत्पादों का आयात किया, जिसमें से 6,374 करोड़ रुपये तो अकेले बासमती का हिस्सा है. इस समय ईरान भारतीय बासमती का तीसरा सबसे बड़ा खरीदार है.

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