
इसराइल के मामले में पीएम नरेंद्र मोदी ने कई परंपराओं की दीवार क्यों तोड़ी
BBC
दूसरे विश्व युद्ध के बाद ब्रिटिश साम्राज्य के पतन के दौरान नौ महीने के अंतर में भारत और इसराइल का आधुनिक राष्ट्र राज्य के रूप में जन्म हुआ था. लेकिन शुरुआत में भारत इसराइल से परहेज़ करता रहा, लेकिन आज हालात कुछ और हैं.
इसराइल के मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारतीय विदेश नीति की पुरानी पंरपराओं को तोड़ने वाले साबित हुए हैं.
भारत की विदेश नीति में कोई भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह इसराइल को लेकर इतना खुलकर सामने नहीं आया.
17 सितंबर 1950 को भारत ने इसराइल को संप्रभु राष्ट्र के रूप में मान्यता दी थी. इसके बाद से किसी प्रधानमंत्री ने इसराइल का दौरा नहीं किया था. यानी क़रीब 76 साल बाद जुलाई 2017 में नरेंद्र मोदी इसराइल दौरा करने वाले पहले प्रधानमंत्री बने. यानी मोदी ने इसराइल नहीं जाने की परंपरा तोड़ी.
2017 में मोदी जब इसराइल गए तो कूटनीतिक परंपरा से अलग क़दम उठाते हुए रामल्ला में फ़लस्तीनी प्राधिकरण की अनदेखी की, जो नेतन्याहू के यरूशलम स्थित परिसर से मुश्किल से 30 मिनट की दूरी पर है.
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मोदी के दौरे में न तो फ़लस्तीन को लेकर समर्थन दिखा था, न ही इसराइल के साथ एक स्वतंत्र फ़लस्तीनी स्टेट का कोई उल्लेख हुआ था. पहले कोई भी अहम भारतीय नेता इसराइल का दौरा करता था तो रामल्ला भी ज़रूर जाता था.
दूसरे विश्व युद्ध के बाद ब्रिटिश साम्राज्य के पतन के दौरान नौ महीने के अंतर में भारत और इसराइल का आधुनिक राष्ट्र राज्य के रूप में जन्म हुआ था. लेकिन शुरू में भारत इसराइल से परहेज़ करता रहा.

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