
आतंकी संगठन 'Boko Haram' की कैद में स्कूली बच्चियों के साथ क्या हुआ, क्यों इनकी आपबीती ने दुनिया को हिला दिया?
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शाहरुख खान की फिल्म पठान के ट्रेलर में ऐसी झलकियां दिखीं, जिससे अनुमान लग रहा है कि कहानी में बोको हराम का भी जिक्र होगा. खूंखार तरीके से नरसंहार के लिए कुख्यात ये चरमपंथी संगठन स्कूली बच्चियों को अगवा करने के लिए भी चर्चा में रहा. सालों बाद कैद से भागी लड़कियों ने बताया कि वे वहां लड़ाकों के लिए यौन गुलाम की तरह रखी जाती थीं.
पिछले दशक भर से भी ज्यादा वक्त से नाइजीरिया में बोको हराम आतंक मचा रहा है. कई बार इसे आतंकी संगठन ISIS से भी खतरनाक कहा जाता है, खासकर इसकी विचारधारा के चलते, जो स्कूलों को बंद करने और चरमपंथी तरीके से जीने पर जोर देती है. जानते हैं, क्या है इसकी कहानी और स्कूली बच्चियों में इसकी क्या दिलचस्पी रही, जो बीते सालों में कई बार उन्हें किडनैप करता रहा.
बोको हराम की नींव ही नफरत पर रखी हुई साल 2002 में बना ये संगठन एक चरमपंथी समूह है जिसका आधिकारिक नाम जमाते एहली सुन्ना लिदावति वल जिहाद है. वैसे नाइजीरिया की भाषा होसा में बोको हराम का मोटा-मोटी अर्थ है- वेस्टर्न सीख हराम है. वैसे बोको का असल मतलब है नकली, लेकिन इसे वेस्ट से जोड़ा गया. नाइजीरिया से किसी भी तरह की चुनी हुई सरकार हटाकर ये लोग अपनी सत्ता लाना चाहते हैं. एक तरह से समझा जाए तो ये ग्रुप नाइजीरिया का तालिबान है, जो मानता है कि एक धर्म विशेष को हर तरह की पश्चिमी चीज से दूर रहना चाहिए.
लड़ाई का ट्रेनिंग सेंटर बन गया उनका इस बात पर खासा जोर है कि लड़कियां घर से बाहर न निकलें और न ही किसी तरह की फॉर्मल शिक्षा पाएं. इसी सोच को लेकर कट्टरपंथी इस्लामिक धर्मगुरु मोहम्मद यूसुफ ने संगठन बनाया. पहले ये गरीब नाइजीरियाई लड़कों को पढ़ाया करता. जल्द ही ये बच्चे उनका सॉफ्ट टारगेट हो गए. पढ़ाते हुए ही उनका ब्रेनवॉश होने लगा और संगठन बढ़ते हुए जिहादी भर्ती सेंटर में बदल गया. यहां लोगों को हथियार चलाने की ट्रेनिंग मिलती ताकि वे इस्लामिक देश की स्थापना कर सकें.
साल 2009 संगठन के लिए नया चैप्टर लेकर आया इस दौरान इस्लामिक शिक्षा तक सीमित इस संगठन ने बड़ा दांव खेलते हुए नाइजीरियाई शहरों पर हमले शुरू कर दिए. तब पलटवार में वहां की आर्मी ने आतंकियों को मारते हुए उसके हेडक्वॉर्टर पर ही कंट्रोल कर लिया और लीडर यूसुफ मारा गया. ये एक तरह से आतंक का खात्म हो सकता था, लेकिन हुआ उल्टा. ग्रुप में एक नया लीडर अबू बकर शेखु आया, जिसने नए लड़ाकों की भर्ती की, उन्हें ज्यादा खूंखार और कट्टरपंथी बना दिया.
मास किडनैपिंग हुई आतंकी सेना समेत आम लोगों पर भी हमले करने लगे. खासकर स्कूली बच्चियों को उठाया जाने लगा. साल 2014 में वहां के चिबोक शहर से लगभग 3 सौ बच्चियों को एक बोर्डिंग स्कूल से अगवा कर लिया गया. घटना के बाद हंगामा मच गया. किसी को भी नहीं पता था कि बच्चियां कहां और किन हालातों में हैं. इस दौरान एक कैंपेन भी चला- ब्रिंग बैक अवर गर्ल्स. हालांकि कोई फायदा नहीं हुआ. लगभग 4 सालों बाद इनमें से कुछ लड़कियां इस शर्त पर छोड़ी गईं कि बदले में सेना की कैद में रहते चरमपंथी लड़ाके छोड़ दिए जाएं.
साल 2019 के आखिर में कुछ बच्चियां आतंकियों की कैद से भाग निकलीं. बोको हराम का सच जानने के लिए उन्हें तुरंत मेनस्ट्रीम नहीं किया गया, बल्कि सख्त निगरानी में अलग रखा गया. सरकार जानना चाहती थी कि उनसे साथ क्या हुआ, वे कहां रहीं और बाकी बच्चियां कहां हैं. बच्चियों ने तब टुकड़ों-टुकड़ों में जो बताया, उसने सबको हिलाकर रख दिया. इंटरनेशनल मीडिया ने इसे लंबे समय तक कवर किया, यहां तक कि यूनाइटेड नेशन्स में भी मामला उठा था.

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