
अडानी जैसे मुसीबत में धीरूभाई भी फंसे थे, लेकिन ऐसा सिखाया सबक... गिड़गिड़ाने लगे थे साजिश रचने वाले!
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अडानी जैसे मामले धीरूभाई अंबानी के साथ साल 1982 में हुआ था. तब धीरूभाई ने अपनी हिम्मत से शेयर मार्केट के कुछ बड़े दलालों को बता दिया था, कि उनकी कंपनी रिलायंस के साथ खेलना कितना खतरनाक साबित हो सकता है.
अमेरिकी रिसर्च फर्म हिंडनबर्ग (Hindenburg Hesearch) के आरोपों से अडानी ग्रुप के शेयरों में भूचाल आ गया है. सभी कंपनियों के शेयरों में बिकवाली से अडानी ग्रुप के चेयरमैन गौतम अडानी की नेटवर्थ (Gautam Adani Net Worth) में भारी गिरावट आई है. जिससे वो टॉप-20 अमीरों की लिस्ट से भी बाहर गए. जबकि इस खुलासे से ठीक पहले अडानी दुनिया के चौथे सबसे अमीर शख्स थे. दरअसल, हिंडनबर्ग ने अडानी के साम्राज्य को हिला दिया है.
हालांकि हिंडनबर्ग के आरोपों का लगातार अडानी ग्रुप ने खंडन किया है, आरोपों को केवल झूठ का पुलिंदा बताया. लेकिन इससे बावजूद शेयर 65 फीसदी तक गिर गए. हफ्तेभर तक गिरावट के बाद अब एक बार अडानी ग्रुप के शेयरों में थोड़ी तेजी देखने को मिल रही है.
शेयर बाजार के इतिहास और शह-मात के खेल को देखें को करीब चार दशक पहले कुछ इसी तरह के मामलों से उद्योगपति धीरूभाई अंबानी का भी सामना हुआ था. धीरूभाई अंबानी ने अपने अंदाज में मामले को निपटाया था. आज भी धीरूभाई अंबानी की उस साहस का जिक्र होता है. धीरूभाई अंबानी की सबसे बड़ी खासियत थी कि वे अपने लक्ष्य को हमेशा बड़ा रखते थे.
दरअसल, अडानी जैसे मामले धीरूभाई अंबानी के साथ साल 1982 में हुआ था. तब धीरूभाई ने अपनी हिम्मत से शेयर मार्केट के कुछ बड़े दलालों को बता दिया था, कि उनकी कंपनी रिलायंस के साथ खेलना कितना खतरनाक साबित हो सकता है. धीरूभाई की हिम्मत की वजह से ही 18 मार्च 1982 को मुंबई स्टॉक एक्सचेंज में हाहाकार मच गया था.
धीरूभाई के साहस को सलाम... साल 1977 में धीरूभाई अंबानी ने अपनी कंपनी रिलायंस को शेयर मार्केट में लिस्ट कराने का फैसला किया. इस वक्त रिलायंस ने 10 रुपये शेयर की दर से करीब 28 लाख इक्विटी शेयर जारी किए. किसी शेयर को बेचने की शुरुआत इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग (IPO) से होती है. एक साल से कम वक्त में रिलायंस कंपनी के शेयर की कीमत 5 गुना ज्यादा बढ़कर 50 रुपये हो गई. फिर 1980 में एक शेयर की कीमत 104 और 1982 में 18 गुना बढ़कर 186 रुपये पर पहुंच गई. ठीक उसी तरह से अडानी ग्रुप के शेयरों में तेजी आई. उसके बाद धीरूभाई ने डिबेंचर्स के जरिये पैसे जुटाने का प्लान बनाया. डिबेंचर्स कंपनियों के लिए कर्ज के जरिए पूंजी जुटाने का तरीका है.
लेकिन तभी कोलकाता में बैठे शेयर बाजार के कुछ दलालों ने रिलायंस के शेयरों को साजिशन गिराने का फैसला किया. इसके लिए एक साथ बड़े पैमाने पर शेयर बेचे जाने लगे. दलालों को उम्मीद थी कि गिरते रिलायंस के शेयरों कोई बड़े निवेशक नहीं खरीदेंगे, और उस समय यह भी नियम था कि कंपनी अपने शेयर खुद नहीं खरीद सकती. एक तरह से दलाल धीरूभाई अंबानी को नौसिखिया मानकर चल रहे थे.

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