
अंगदान से साहित्य और लोककला तक... गुजरात के पांच नागरिकों को पद्मश्री का ऐलान
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77वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर केंद्र सरकार ने पद्म पुरस्कारों की घोषणा की, जिसमें गुजरात के पांच नागरिकों को पद्मश्री से सम्मानित किया गया. नीलेश मांडलेवाला, हाजी कासम मीर, रतिलाल बोरिसागर, अरविंद वैद्य और धार्मिकलाल पंड्या को यह सम्मान दिया गया.
इस साल गुजरात के पांच लोगों को पद्म पुरस्कार मिलने की घोषणा की गई है. नीलेश मांडलेवाला, हाजी कासम मीर (हाजी रमकडू), रतिलाल बोरिसागर, अरविंद वैद्य और धार्मिकलाल पंड्या को पद्म श्री से सम्मानित किया गया है.
भारत के 77वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर केंद्र सरकार ने पद्म पुरस्कारों की घोषणा की है. कला, सामाजिक सेवा, शिक्षा और चिकित्सा जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले गुजरात के पांच नागरिकों को पद्म श्री पुरस्कार के लिए चुना गया है.
सूरत के अंगदान अभियान के अगुआ नीलेश मांडलेवाला, जूनागढ़ के हाजी रमकडू के नाम से मशहूर हाजी कासम मीर, जो अपने ढोल के लिए देश-विदेश में प्रसिद्ध हैं, वडोदरा के धार्मिकलाल पंड्या, जिन्होंने माणभट्ट की 350 साल पुरानी परंपरा को जीवित रखा है, साहित्य में प्रसिद्ध हास्यकार और निबंधकार रतिलाल बोरिसागर और कला क्षेत्र में जाने-माने फिल्म अभिनेता रहे अरविंद वैद्य को पद्म श्री देने की घोषणा की गई है.
सूरत के नीलेश विनोदचंद्र मांडलेवाला को सामाजिक कार्यों के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया है. उन्हें गुजरात में अंगदान अभियान का अगुआ माना जाता है और वे डोनेट लाइफ संगठन के संस्थापक हैं. वर्ष 1997 में नीलेशभाई के पिता की किडनी खराब हो गई थी. वर्ष 2004 से उन्हें नियमित डायलिसिस कराना पड़ता था. इस दौरान रोगी और परिवार की असहनीय पीड़ा को देखकर नीलेशभाई ने इस क्षेत्र में काम करने का दृढ़ संकल्प लिया. उनके पिता का देहांत सितंबर 2011 में हुआ. इससे पहले वर्ष 2006 से किडनी दान के साथ उनका अभियान शुरू हुआ था, जो धीरे-धीरे यकृत, अग्न्याशय, हृदय, फेफड़े, आंतें, हाथ और अस्थि दान तक विस्तारित हो गया. अंगदान अभियान में 22 जनवरी 2026 तक कुल 1366 अंगों और ऊतकों का दान किया जा चुका है, जिससे देश और विदेश के विभिन्न राज्यों के कुल 1258 लोगों के जीवन में महत्वपूर्ण योगदान मिला है.
गिरनार की गोद में बसे जूनागढ़ शहर के लिए यह गौरव का क्षण है. भारत सरकार ने जूनागढ़ के प्रसिद्ध ढोलक वादक हाजीभाई कासमभाई मीर, जिन्हें ‘हाजी रमकडू’ के नाम से जाना जाता है, को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक पद्म श्री से सम्मानित करने की घोषणा की है. पिछले छह दशकों से ढोलक की थाप से दुनिया को मंत्रमुग्ध करने वाले इस कलाकार को जब सम्मान की खबर मिली तो वे बेहद भावुक हो गए. 80 वर्ष के हो चुके हाजीभाई ने इस घोषणा के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हार्दिक धन्यवाद दिया. हाजी रमकडू का जन्म 17 मई 1951 को सोमनाथ के अदारी गांव में हुआ था. उन्हें संगीत विरासत में मिला, क्योंकि उनके पिता और दादा भी इस कला से जुड़े हुए थे. महज 9 साल की उम्र में ढोलक बजाना शुरू करने वाले हाजीभाई ने वंजारी चौक की गरबी में ढोल बजाकर अपनी पहली कमाई 15 रुपये की थी. उनके मित्र शंकरभाई रावल ने उनकी ढोल बजाने की अनूठी शैली देखकर उन्हें ‘रमकडू’ नाम दिया, जो बाद में उनकी पहचान बन गया.
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