
Margashirsha Amavasya: मार्गशीर्ष अमावस्या पर इस खास उपाय से दूर होंगे सारे दुख, मिलेगी मां लक्ष्मी की कृपा
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Margashirsha Amavasya: हिंदू कैलेंडर के मार्गशीर्ष माह को अगहन और अग्रहरण्य के नाम से भी जाना जाता है. इस महीने पड़ने वाली मार्गशीर्ष अमावस्या बेहद खास होती है. इस बार यह अमावस्या 19 नवंबर की सुबह से शुरू होकर 20 नवंबर को दोपहर में खत्म होगी.
हिंदू पंचांग में मार्गशीर्ष मास का विशेष धार्मिक महत्व है. इसे अगहन या अग्रहायण भी कहा जाता है. इसी माह के कृष्ण-पक्ष की अमावस्या तिथि को मार्गशीर्ष अमावस्या कहा जाता है. यह तिथि पितृ-कार्य, स्नान-दान और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए बेहद शुभ मानी जाती है. वैदिक पंचांग के अनुसार, मार्गशीर्ष अमावस्या तिथि 19 नवंबर को सुबह 09 बजकर 43 मिनट पर शुरू हो रही है. वहीं, इस तिथि का समापन अगले दिन 20 नवंबर को दोपहर 12 बजकर 16 मिनट हो रहा है. उदयातिथि के अनुसार, 20 नवंबर को ही मार्गशीर्ष अमावस्या मनाई जाएगी.
क्या होती है अमावस्या
“अमावस्या” की रात को आकाश में चंद्रमा दिखाई नहीं देता. यह नवचंद्र की स्थिति मानी जाती है. मार्गशीर्ष अमावस्या को विशेष महत्व इसलिए दिया जाता है क्योंकि यह मार्गशीर्ष मास की प्रमुख तिथियों में से एक है और पितृ-श्रद्धा और धार्मिक कर्मों के लिए उपयुक्त समय माना जाता है. इस दिन कुछ खास उपाय करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है. जानते हैं उन उपायों के बारे में
पवित्र नदी या गंगाजल से स्नान मार्गशीर्ष अमावस्या के दिन पवित्र नदी में स्नान करने से पापों का क्षय होता है और मन व शरीर पवित्र होते हैं.अगर नदी में जाकर स्नान संभव न हो, तो घर में स्नान के जल में कुछ बूंदें गंगाजल मिला कर नहाने से भी वही पुण्य मिलता है.
दान का विशेष महत्व इस दिन किया गया दान कई गुना फल देता है. भोजन दान, कपड़ा दान, तिल-गुड़ या अनाज का दान विशेष रूप से शुभ माना जाता है. माना जाता है कि इससे जीवन की परेशानियां दूर होने लगती हैं और रुके हुए कार्य पूरे होने लगते हैं.
पितृ तर्पण और भोजन अर्पण अमावस्या पितरों को समर्पित तिथि है. इस दिन पितरों को याद कर उनका आशीर्वाद लिया जाता है. परंपरा के अनुसार इस दिन गाय, कुत्ते और कौवे को भोजन कराना अत्यंत शुभ होता है. इसे पितृ तृप्ति का मार्ग माना जाता है और इससे पितरों की कृपा बनी रहती है.

Chalisa Yog: ज्योतिष शास्त्र में चालीसा योग उस स्थिति को कहा जाता है जब दो ग्रह आपस में 40 अंश (डिग्री) की दूरी पर स्थित होते हैं. इस योग का नाम ही “चालीसा” है, क्योंकि इसका संबंध 40 अंश के अंतर से होता है. चालीसा योग का प्रभाव हर राशि पर समान नहीं होता. यह ग्रहों की स्थिति, भाव और व्यक्ति की कुंडली पर निर्भर करता है कि यह योग शुभ फल देगा या सावधानी की जरूरत पैदा करेगा.

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