
Kamakhya Mandir: रहस्यों से भरा है कामाख्या देवी मंदिर, जहां सोनम रघुवंशी ने पति राजा से दर्शन की रखी थी शर्त
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Kamakhya Mandir: रिलायंस जियो इंफोकॉम लिमिटेड के चेयरमैन आकाश अंबानी 29 जून गुरुवार को असम के गुवाहाटी में स्थित प्रसिद्ध कामाख्या मंदिर में दर्शन करने पहुंचे थे. दरअसल, इस मंदिर की महिमा ही कुछ ऐसी है कि यहां पर हर रोज लाखों की संख्या में भक्त दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं.
Kamakhya Mandir: सोनम रघुवंशी कामाख्या देवी के दर्शन करने के बहाने से राजा रघुवंशी को गुवाहाटी (असम) लेकर गई थी. सोनम ने राजा के सामने यह शर्त रखी थी कि वो मां कामाख्या के दर्शन के बाद ही एक दूसरे के करीब आएंगे, क्योंकि उसने एक मन्नत मांगी है. मंदिर में राजा रघुवंशी की एक तस्वीर भी सामने आई है. देवी के 51 शक्तिपीठों में से एक माता कामाख्या का मंदिर दुनियाभर में प्रसिद्ध है. देश-दुनिया के कोने-कोने से भक्त यहां देवी के दर्शन करने आते हैं. आइए आज आपको इस चमत्कारी मंदिर के बारे में विस्तार से बताते हैं.
कामाख्या शक्तिपीठ असम के गुवाहाटी शहर से 8 किलोमीटर पश्चिम में नीलांचल पर्वत पर स्थित एक अत्यंत पवित्र स्थल है. यह शक्तिपीठ माता सती के शरीर के अंगों के गिरने से बने 51 शक्तिपीठों में सबसे प्रमुख माना जाता है. पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने सुदर्शन से माता सती के मृत शरीर को 51 भागों में विभाजित किया था. माता सती के अंग जहां जहां गिरे वहां शक्तिपीठ बना. कामाख्या शक्तिपीठ में माता सती का योनि भाग गिरा था. मान्यता है कि इस शक्तिपीठ में माता रजस्वला होती हैं, जो इसकी विशेषता को और भी बढ़ाता है. यह स्थल भक्तों के लिए अत्यधिक पूजनीय है और यहां की शक्ति और महत्व को महसूस करने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं.
मंदिर में माता की मूर्ति नहीं है स्थापित
कामाख्या मंदिर बहुत ही पूजनीय धार्मिक स्थल माना जाता है, जहां देवी की मूर्ति नहीं बल्कि एक पवित्र कुंड है जो फूलों से सुसज्जित रहता है. यहां देवी के योनि भाग की पूजा की जाती है, जो इसे एक शक्तिशाली शक्तिपीठ बनाता है. पास ही एक अन्य मंदिर में देवी की मूर्ति स्थापित है, लेकिन मुख्य आकर्षण योनि भाग की पूजा ही है.
यहां माता होती हैं हर साल रजस्वला
कामाख्या पीठ की एक प्राचीन और रोचक कथा है. मान्यता है कि माता सती का योनि भाग इस स्थान पर गिरा था, जिससे यह स्थल हर साल तीन दिन के लिए रजस्वला का साक्षी बनता है. इन तीन दिनों में मंदिर के पट बंद रहते हैं. ऐसी भी मान्यता है कि इन तीन दिनों में मां को एक सफेद रंग वस्त्र चढ़ाया जाता है, जो माता माता के रज से रंगीन हो जाता है. इसे अम्बुवाची वस्त्र के नाम से जाना जाता है. इस वस्त्र को भक्तों को प्रसाद के रूप में दिया जाता है. जो भक्तों के लिए सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है. मान्यता है कि जो भी उस लाल वस्त्र को अपने पास रखता है, उससे काल भी दूर हो जाता है.

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