
Jafar Panahi: बैन के बावजूद तानाशाही को चुनौती देने वाला बागी फिल्ममेकर, जिसने लगाया था ‘डेथ-टू-डिक्टेटर’ का नारा
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ईरान पर हालिया हमलों और बढ़ते राजनीतिक तनाव के बीच जाफर पनाही की कहानी फिर सुर्खियों में है. 20 साल के बैन और गिरफ्तारी के बावजूद उन्होंने सत्ता के खिलाफ फिल्में बनाईं और ‘डेथ टू डिक्टेटर’ का नारा लगाकर तानाशाही को खुली चुनौती दी. जानिए उनके संघर्ष, सिनेमा और ईरान की राजनीति से जुड़ी पूरी कहानी.
ईरान पर हालिया हमलों और मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच एक नाम फिर से चर्चा में है- जफर पनाही. वो फिल्ममेकर जिसने सिर्फ कैमरे से कहानी नहीं कही, बल्कि तानाशाही के खिलाफ खुली चुनौती दी. 'डेथ टू डिक्टेटर' का नारा लगाते हुए उन्होंने ईरान की सत्ता को सीधी टक्कर दी, और बैन के बावजूद ऐसी फिल्में बना डालीं, जो सिस्टम की जड़ों को हिला देती हैं.
सत्ता से टकराव की शुरुआत
जफर पनाही लंबे समय से ईरानी सरकार की नीतियों के आलोचक रहे हैं. 2009 के चुनावी विरोध प्रदर्शनों के बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया. 2010 में ईरान की अदालत ने उन पर 20 साल तक फिल्म बनाने, इंटरव्यू देने और देश से बाहर जाने पर प्रतिबंध लगा दिया. लेकिन पनाही ने चुप रहना स्वीकार नहीं किया.
जब देश में सेंसरशिप कड़ी हो रही थी और असहमति को देशद्रोह बताया जा रहा था, पनाही ने घर को ही स्टूडियो बना लिया. उन्होंने 2011 में ‘This Is Not a Film’ बनाई- एक ऐसी फिल्म, जिसे पेन ड्राइव में छुपाकर देश से बाहर भेजा गया और कान फिल्म फेस्टिवल में दिखाया गया. ये सिर्फ फिल्म नहीं, बल्कि सिस्टम के खिलाफ एक प्रतीकात्मक बगावत थी.
‘खामेनेई की नाक के नीचे’ फिल्म
कहा जाता है कि पनाही ने कई फिल्में ऐसी बनाई, जो खुलेआम ईरानी सत्ता की आलोचना करती थीं, और वो भी उसी देश में रहते हुए. ‘Taxi’ (2015) में उन्होंने खुद टैक्सी ड्राइवर बनकर समाज की असलियत दिखाई. ‘3 Faces’ और ‘No Bears’ जैसी फिल्मों में भी सत्ता, डर और आम नागरिक की घुटन साफ नजर आती है.

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