
India Today Conclave: एल्कोहल-ड्रग-फर्स्ट सेक्सुअल रिलेशन की तरह सुसाइड-डिप्रेशन की भी औसत उम्र घटी
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India Today Conclave 2023: देश में युवाओं की आत्महत्या चिंताजनक स्तर पर बढ़ी है. 18 से 35 साल के युवाओं में ऐसी क्या मायूसी या नाउम्मीदी है कि वो आत्महत्या की तरफ झुक रहे. इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में एक्सपर्ट ने इस पर चर्चा की, जिसमें कई जरूरी तथ्य सामने आए जो आपको भी समझने चाहिए.
गुरुवार को मुंबई में इंडिया टुडे कॉन्क्लेव-2023 (India Today Conclave-2023) में 'यूथ होपलेसनेस एंड हेल्पलेसनेस अंडरस्टैंडिंग व्हाट लीड्स टू सुसाइड' सेशन में युवाओं के मानसिक स्वस्थ्य पर चर्चा हुई.
आज जिस तरह बड़ी संख्या में स्टूडेंट डिप्रेशन का शिकार हैं. एक साल में स्टूडेंट सुसाइड बढ़ा है, इसमें युवा महिलाओं की संख्या 8 पर्सेंट ज्यादा है. कोचिंग हब कोटा से नौ महीने में 27 सुसाइड हो चुके हैं ऐसे में युवाओं की मेंटल हेल्थ पर इस चर्चा ने सभी को सोच का एक नया आयाम दिया.
इस चर्चा में मनोचिकित्सक डॉ हरीश शेट्टी ने सबसे पहले अपनी राय रखी. उन्होंने कहा कि हम रैपिड सोशल चेंज के मिड में है. आज हाल ये हैं कि लोग बिना जाने उस फेसबुक फ्रेंड को भी शुभकामना दे रहे हैं जो मर चुका है. इसका सीधा अर्थ यह है कि अब लोगों में भावनात्मक जुड़ाव कम हुआ है. आपसी रिश्तों में संवाद कम हुआ है. उन्होंने इसमें सरकार की नीति पर भी निशाना साधा.
NEP में भी नहीं है मेंटल हेल्थ डॉ शेट्टी ने कहा कि अभी हाल ही में नेशनल एजुकेशन पॉलिसी लाई गई. ये फाउंडेशन फॉर बिल्डिंग न्यू इंडिया के उद्देश्य से लाई गई. लेकिन इसमें कुछ भी मेंटल हेल्थ के लिए नहीं है. नेशनल करीकुलम फ्रेमवर्क में भी कुछ नहीं है. आज जब मेंटल हेल्थ एपेडेमिक का दौर है. युवा बोलने को तैयार हैं, पर कोई सुनने वाला नहीं है. स्वच्छ भारत अभियान, और कोविड अभियान की तरह मेंटल हेल्थ कैंपेन चलाना होगा. यह एक बहुत बड़ा क्राइसिस है, ऐसे में हम सबको जिम्मेदार होना होगा.
आज एज डाउन हुई है- डॉ शेट्टी युवाओं में मानसिक समस्याओं पर डॉ शेट्टी ने कहा कि इसमें सबसे पहले हमें एज को किनारे रखना होगा. अब एज का दायरा नीचे हो गया है. सुसाइड करने की निम्नतम आयु कम हो गई है. डिप्रेशन के फर्स्ट एपिसोड की एज कम हो गई है. फर्स्ट सेक्सुअल इंटरकोर्स की एज कम हो गई है. पहली बार ड्रग या एल्कोहल लेने की एज का दायरा घटा है. इसी तरह पहली बार जुवनाइल ऑफेंस की एज भी घटी है. एक एज को नहीं कह सकते. बच्चे से लेकर बुजुर्ग से लेकर युवा बच्चे सभी मेंटल हेल्थ एपिडेमिक से जूझ रहे.
अगर ये हालात नहीं सुधरे तो देश में उत्पादन से लेकर आर्थिक स्थिति, शारीरिक रोगों की वृद्धि हर तरह इसका असर दिखेगा. मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को समझने के लिए सिर्फ आत्महत्या के आंकड़े ही अकेला जरिया नहीं हैं. आज सड़क पर होने वाले झगड़े, मर्डर, फैमिली इश्यूज को देखिए. इन सबके पीछे के कारणों को समझिए. आज हर तरफ जागरूकता और मेंटल हेल्थ स्क्रीनिंग के लिए अभियान चलाना जरूरी है.

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