
Exclusive: रियलिटी चेक में खुली स्लीपर बसों पोल, नियमों को ठेंगा दिखा रहे ऑपरेटर, मौत का लाइसेंस बांट रहा विभाग
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आजतक के रियलिटी चेक में दिल्ली, यूपी, एमपी और राजस्थान की स्लीपर बसों में सुरक्षा मानकों की धज्जियां उड़ती मिलीं. इमरजेंसी गेटों पर सीटें लगी हैं, छतों पर अवैध सामान लदा है और अग्निशमन यंत्र नदारद हैं. पिछले 3 वर्षों में 64 मौतें होने के बावजूद प्रशासन और बस ऑपरेटर बेखौफ हैं.
कायदे-कानून को ताक पर रखकर देश के तमाम राज्यों में यात्रियों की जिंदगी से खुल्लम-खुल्ला खिलवाड़ हो रहा है. पूरा खेल परमिट की आड़ में चल रहा है. हम आपको सड़कों पर दौड़ रही स्लीपर बसों का डरावना सच दिखा रहे हैं कि कैसे यात्रियों से पूरा पैसा वसूला जाता है, लेकिन सुरक्षा की गारंटी के नाम पर आंखों में धूल झोंकने का खेल चल रहा है.
बस ऑपरेटर सुरक्षा मानकों की खुलेआम धज्जियां उड़ा रहे हैं, सवाल यात्रियों की जिंदगी का है लिहाजा जरूरी है, जिम्मेदारों की नींद तोड़ना. आज हम उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, दिल्ली और पंजाब के परिवहन मंत्रियों से सवाल पूछ रहे हैं, आखिर स्लीपर बसों को जान लेने का परमिट कब तक मिलता रहेगा?
'आजतक' की टीम जब सरकारी दावों की पड़ताल करने निकली, तो दिल्ली से राजस्थान तक, मध्य प्रदेश से पंजाब तक, स्लीपर बसों में मौजूद सुरक्षा इंतजामों की रोंगटे खड़े कर देने वाली हकीकत कैमरे में कैद हुई. ये हालात तब हैं जब देश की संसद में सरकार ने माना कि बीते तीन सालों में 64 यात्रियों की मौत स्लीपर बस में जिंदा जलने से हुई. देश के केंद्रीय परिवहन मंत्री मौत का गोला बन रही स्लीपर बसों को लेकर नए नियम बनाने का दावा करते हैं.
यही नहीं, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 27 नवंबर को सभी राज्यों के प्रमुख सचिवों से सुरक्षा इंतजामों का कड़ाई से पालन करवाने का निर्देश दिया, लेकिन जमीन पर हालात जस के तस हैं. बस ऑपरेटर खुल्लम-खुल्ला कायदे और कानून को चुनौती दे रहे हैं और लगाम लगाने वाले जिम्मेदार आंख मूंदकर बैठे हैं.
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दिल्ली की स्लीपर बसों का हाल

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