
5 ब्राह्मण विधायक, एक सांसद... इटावा कांड के बाद की विरोधभरी सियासत सपा को भारी न पड़ जाए?
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समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव इटावा कांड के बाद खुलकर कथावाचकों के पक्ष में उतर आए. अखिलेश ने ब्राह्मणों के लिए प्रभुत्ववादी, वर्चस्ववादी विशेषण का इस्तेमाल किया. यह विरोधभरी सियासत कहीं सपा के लिए बैकफायर ना कर जाए.
उत्तर प्रदेश की सियासत में इन दिनों जातीय रंग गाढ़ा हो चला है. इटावा के दांदरपुर में यादव कथावाचकों की जाति पूछकर पिटाई, सिर मुंडवाए जाने, चुटिया काटे जाने और मूत्र का छिड़काव किए जाने की घटना में आरोप ब्राह्मणों पर लगा है. इस घटना के बाद समाजवादी पार्टी (सपा) खुलकर यादव कथावाचकों के पक्ष में उतर आई.
सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने तो यहां तक कह दिया कि सच्चे कृष्ण भक्तों को अगर कथा कहने से रोका जाएगा तो ये अपमान कोई क्यों सहेगा. उन्होंने तंज करते हुए यह तक चुनौती दे दी कि प्रभुत्ववादी और वर्चस्ववादी लोग यह घोषित कर दें कि पीडीए की ओर से दिया गया दान, चढ़ावा कभी स्वीकार नहीं करेंगे.
सपा के खुलकर पीड़ित कथावाचक मुकुट मणि यादव और संत यादव के पक्ष में उतर आने और अखिलेश के कटाक्ष के बाद अहीर रेजिमेंट और अन्य यादव संगठनों ने ब्राह्मणों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. इटावा की घटना के बाद इस मामले ने जिस तरह से जातीय रंग ले लिया है, अब बात इसे लेकर होने लगी है कि अखिलेश यादव का एंटी ब्राह्मण कार्ड कहीं उनकी अगुवाई वाली सपा के लिए बैकफायर ना कर जाए?
यूपी में 10 फीसदी ब्राह्मण वोट
उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मणों का वर्चस्व रहा है. सूबे के कुल मतदाताओं में अनुमानों के मुताबिक ब्राह्मणों की भागीदारी करीब 10 फीसदी है. अनुमानों की मानें तो यूपी की लगभग हर विधानसभा सीट पर कम से कम पांच हजार से अधिक ब्राह्मण वोटर हैं. सूबे के करीब 30 जिलों की लगभग 100 विधानसभा सीटों पर जीत-हार तय करने में ब्राह्मण मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं.
सीटों का यह आंकड़ा पूर्ण बहुमत के लिए जरूरी 202 के जादुई आंकड़े का करीब-करीब आधा है. फैजाबाद, वाराणसी, जौनपुर, गोरखपुर, बलिया, गोंडा, बस्ती, महराजगंज, कानपुर, रायबरेली, अमेठी, सीतापुर, हरदोई, प्रयागराज, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, झांसी, हरदोई जैसे जिले ब्राह्मण वोटर्स का गढ़ माने जाते हैं.

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