
400वां प्रकाश पर्व: साल 1675, औरंगजेब, लाल किला... PM के भाषण से पहले क्रोनोलॉजी समझिए
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आखिर इस ऐतिहासिक कार्यक्रम के लिए दिल्ली के लाल किले को ही क्यों चुना गया? वो कौन सा इतिहास है जिस वजह से पीएम मोदी ने लाल किले से देश को संबोधित करने की ठानी?
गुरु श्री तेग बहादुर के 400वें प्रकाश पर्व का उत्सव जोर-शोर मनाया जाएगा. कुछ ही देर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाल किले से देश के नाम संबोधन कर एक इतिहास रचने जा रहे हैं. वे आजाद भारत के इकलौते ऐसे प्रधानमंत्री होने वाले हैं जो सूर्यास्त के बाद लाल किले से राष्ट्र को संबोधित करेंगे.
लेकिन सवाल ये आता है कि आखिर इस ऐतिहासिक कार्यक्रम के लिए दिल्ली के लाल किले को ही क्यों चुना गया? वो कौन सा इतिहास है जिस वजह से पीएम मोदी ने लाल किले से देश को संबोधित करने की ठानी? अब सबसे पहले लाल किले के उस इतिहास को ही समझते हैं.
गुरु तेग बहादुर के चार सौवें प्रकाश पर्व की लाल किले से विशेष अहमियत जुड़ी हुई है. इसी किले से मुगल शासक औरंगजेब ने 1675 में गुरु तेग बहादुर को फांसी देने का आदेश जारी किया था. इसी वजह से लालकिले को गुरु तेग बहादुर की 400वीं जयंती के आयोजन स्थल के रूप में चुना गया.
अब लाल क़िले ने मुग़लिया सल्तनत का स्वर्णिम युग भी देखा और मुग़लिया सल्तनत का सूरज ढलते हुए भी देखा है. इसने राजनीतिक षड्यंत्र, प्यार-मोहब्बत और शहंशाहों का अंत भी देखा है. साल 1857 की क्रांति के दौरान लाल क़िला ब्रिटिश राज के ख़िलाफ़ विद्रोह का भी गवाह बना, इसी लालकिले बहादुरशाह जफर का जलवा भी देखा. लेकिन अब लाल किला तैयार है ,इस देश के स्वाभिमान को सर्वोच्च शिखर तक पहुंचाने वाले बलिदान को याद करने के लिए.
सिख इतिहास के मुताबिक महज़ 14 वर्ष की उम्र में ही गुरु तेग बहादुर ने अपने पिता के साथ मुगलों के हमले के खिलाफ हुए युद्ध में ऐसी बहादुरी दिखाई कि उससे प्रभावित होकर उनके पिता ने ही उनका नाम ‘तेग बहादुर’ यानी ‘तलवार का धनी’ रखा था. इसे भी संयोग हो समझा जायेगा कि गुरु नानक के बाद गुरु तेग बहादुर ही ऐसे गुरु थे, जिन्होंने पंजाब से बाहर सर्वाधिक उदासियां यानी लोगों को पाखंड के जंजाल से मुक्त करने और जागरूक बनाने के लिए यात्राएं कीं.
लाल किले में लॉन से करेंगे संबोधित

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