
होम कंट्री के न अपनाने पर क्या निर्जन द्वीप ही शरणार्थियों का अकेला सहारा, क्या है थर्ड कंट्री डिपोर्टेशन, जिस पर उठे सवाल?
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अमेरिका समेत कई देशों ने मास डिपोर्टेशन मुहिम चला रखी है. जो लोग वैध तरीके से नहीं आए, उन्हें हिरासत में लेकर वापस उनके देश भेजा जा रहा है. जिन्हें उनके देश अपनाने को राजी नहीं, उन्हें किसी तीसरे देश में डिपोर्ट किया जा सकता है. ये मुल्क भी घुसपैठियों को अपने मुख्य शहरों नहीं, बल्कि किसी दूरदराज के द्वीप में बसा सकते हैं.
हाल-हाल के समय में पश्चिम के लगभग सारे देश माइग्रेंट्स पर ज्यादा ही उग्र हो चुके. अमेरिका से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक अपनी जमीन पर उनकी आबादी कम करने में जुटे हैं. अगर संबंधित देश अपने लोगों को स्वीकार न करें तो उन्हें थर्ड कंट्री में भेजा जा सकता है. पैसों के बदले लोगों को अपने यहां बसाने को तैयार ये देश भी उन्हें सीधे अपने बड़े शहरों में नहीं, बल्कि निर्जन द्वीपों पर बसाने की योजना में हैं.
इन दिनों कई देश अवैध रूप से अपने क्षेत्र में प्रवेश करने वाले प्रवासियों को तीसरे देश भेजने के लिए समझौते कर रहे हैं. इसे थर्ड-कंट्री डिपोर्टेशन कहते हैं. इसमें घुसपैठियों को न तो गेस्ट देश स्वीकारता है, न ही उनका अपना मुल्क. ऐसे में गेस्ट कंट्री किसी थर्ड से करार करती है कि वो अवैध प्रवासियों को अपने यहां रख ले.
निश्चित हेड काउंट पर निश्चित रकम दी जाती है. बीते दिनों अमेरिका ने कई देशों के साथ ऐसे समझौते किए, जिनमें ग्वाटेमाला, कोस्टा रिका, पनामा, कोसोवो, रवांडा, और इस्वातिनी शामिल हैं. ये अमेरिकी प्रवासियों को अपने यहां रखेंगे.
ऑस्ट्रेलिया भी घुसपैठ पर सख्त हो चुका. वहां अवैध तौर पर आए लोग नाउरु जैसे तीसरे देश में भेजे जा सकते हैं. दो दशक पहले भी ये प्रोसेस की गई थी. दक्षिण प्रशांत महासागर में स्थित देश असल में द्वीपों से बना है. वहां के निर्जन आइलैंड पर नए लोग बसाए जा सकते हैं. इसके बदले में नाउरु सरकार को 2.5 बिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर मिलेगा.
ब्रिटेन ने भी नियम तोड़कर भीतर आए लोगों को रवांडा भेजने के लिए एग्रीमेंट किया था. लेकिन भारी विरोध के बीच इस प्लान को खत्म कर दिया गया, या कम से कम संसद में यही कहा गया. इमिग्रेंट्स को सुरक्षा आश्वासन देने के बीच भी साल 2024 में लेबर सरकार ने 35 हजार से ज्यादा लोगों को बाहर निकाला, जो पिछले साल की तुलना में 25 फीसदी ज्यादा था.
अब बात करें यूरोप की, तो वहां भी ऐसी योजना पर बात हो रही है. मई में यूरोपियन यूनियन ने इसी तरह का प्रस्ताव दिया, जिसमें लोगों को तीसरे देशों में भेजा जा सकता है. शरण के लिए आवेदन कर रहे लोग भी वहां डिपोर्ट हो सकते हैं.

लेकिन अब ये कहानी उल्टी घूमने लगी है और हो ये रहा है कि अमेरिका और चीन जैसे देशों ने अमेरिका से जो US BONDS खरीदे थे, उन्हें इन देशों ने बेचना शुरू कर दिया है और इन्हें बेचकर भारत और चाइना को जो पैसा मिल रहा है, उससे वो सोना खरीद रहे हैं और क्योंकि दुनिया के अलग अलग केंद्रीय बैंकों द्वारा बड़ी मात्रा में सोना खरीदा जा रहा है इसलिए सोने की कीमतों में जबरदस्त वृद्धि हो रही हैं.

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