
हाईकोर्ट ने कहा था- 'लड़कियों को यौन इच्छाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए', अब सुप्रीम कोर्ट ने पलटा फैसला
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सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाई कोर्ट के विवादास्पद फैसले को पलटते हुए कहा कि किशोरों से जुड़े मामलों में न्यायाधीशों को विशेष संवेदनशीलता और सावधानी बरतने की जरूरत है. कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए दिशा-निर्देश भी जारी किए कि निर्णय में जजों के व्यक्तिगत विचार शामिल नहीं होने चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण और विवादास्पद मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें किशोर लड़कियों को अपनी यौन इच्छाओं पर नियंत्रण रखने और अपने शरीर की अखंडता की रक्षा करने की सलाह दी गई थी. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने न केवल हाईकोर्ट के फैसले को खारिज किया, बल्कि न्यायाधीशों के लिए ऐसे मामलों में निर्णय लिखने के लिए दिशा-निर्देश भी जारी किए, जिससे भविष्य में इस तरह की गलतियां दोबारा न हों.
जस्टिस ए.एस. ओका की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि किशोरों से जुड़े मामलों में विशेष संवेदनशीलता और सावधानी बरतने की आवश्यकता है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में जोर दिया कि न्यायालयों के फैसलों में जजों के व्यक्तिगत विचारों को शामिल नहीं किया जाना चाहिए. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि निर्णय संक्षिप्त, सरल भाषा में और तथ्यों पर आधारित होना चाहिए. इसमें गैर-जरूरी और अप्रासंगिक बातें शामिल न हों. सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि निर्णय किसी साहित्यिक लेखन की तरह नहीं होना चाहिए, बल्कि सीधे मुद्दे पर केंद्रित होना चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाईकोर्ट द्वारा दिए गए उस फैसले को भी खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि 16 साल से ऊपर के किशोरों के बीच सहमति से होने वाले यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया जाना चाहिए. हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि किशोर लड़कियों को अपनी यौन इच्छाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए और समाज में 'दो मिनट के आनंद' के लिए अपने शरीर के अधिकारों को नहीं खोना चाहिए. इसके साथ ही, कोर्ट ने यह भी कहा था कि युवा लड़कों को लड़कियों की शारीरिक स्वायत्तता, गरिमा, और उनके अधिकारों का सम्मान करना चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट ने इन टिप्पणियों को 'अप्रासंगिक और चौंकाने वाला' करार दिया. साथ ही कोर्ट ने कहा कि इस तरह की टिप्पणियां निर्णय के लिए आवश्यक नहीं थीं और यह केवल भ्रम और विवाद को बढ़ाने वाली थीं. कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि अपीलीय अदालत को सबूतों का पुनर्मूल्यांकन करते हुए एक ठोस और तार्किक निष्कर्ष पर पहुंचना चाहिए, और निर्णय को केवल कानूनी और तथ्यात्मक मुद्दों तक सीमित रखना चाहिए.
इसके साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सजा का फैसला एक विशेषज्ञ समिति को सौंप दिया है, जो मामले की सभी बारीकियों और तथ्यों का अध्ययन कर उचित सजा का निर्धारण करेगी.

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