
पेशवा बाजीराव से रानी बैजाबाई तक... अहिल्याबाई के अलावा किस-किस ने संवारा था मणिकर्णिका घाट
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वाराणसी के मणिकर्णिका घाट का इतिहास पौराणिक मान्यताओं, ऐतिहासिक घटनाओं और कई शासकों के संरक्षण से जुड़ा है. हाल ही में घाट के जीर्णोद्धार को लेकर विवाद उठे हैं, जिससे स्थानीय लोग नाराज़ हैं. महारानी अहिल्याबाई होल्कर सहित कई शासकों ने घाट के पुनर्निर्माण में योगदान दिया.
वाराणसी का प्रसिद्ध मणिकर्णिका घाट इन दिनों चर्चा में है. बाबा विश्वनाथ कॉरिडोर बनने के बाद ‘महाश्मशान’ के नाम से पहचाने जाने वाले इस घाट को भी व्यवस्थित करने की ज़रूरत महसूस की गई, लेकिन इसके लिए किए जा रहे हालिया बदलावों ने लोगों के एक वर्ग को नाराज़ कर दिया है.
मणिकर्णिका घाट का इतिहास केवल वर्तमान विवाद तक सीमित नहीं है. इसकी परतों में चिताओं की धधकती आग, मनों-टनों जलती लकड़ियों से उठता धुआं और राख के ढेरों के बीच दबी सदियों पुरानी उथल-पुथल भरी कहानियां छिपी हैं.
इन कहानियों में पौराणिक मान्यताएं हैं, ऐतिहासिक हमले हैं और फिर उनसे उबरने के लिए बार-बार कराए गए जीर्णोद्धार भी. आमतौर पर मणिकर्णिका के पुनर्निर्माण की चर्चा होते ही मालवा की शासिका महारानी अहिल्याबाई होल्कर का नाम सामने आता है. उन्होंने देशभर में कई टूटे मंदिरों और तीर्थ स्थलों का जीर्णोद्धार कराया, जिनमें बाबा विश्वनाथ धाम के साथ-साथ मणिकर्णिका श्मशान घाट भी शामिल था.
लेकिन मणिकर्णिका का इतिहास केवल अहिल्याबाई तक सीमित नहीं है. उनसे पहले और बाद में भी कई शासकों, संतों और दानदाताओं ने इस घाट के निर्माण और संरक्षण में भूमिका निभाई.
पुराणों में मणिकर्णिका की महिमा
महाश्मशान के इतिहास का सिरा पौराणिक मान्यताओं तक जाता है. स्कंद पुराण के काशी खंड में वर्णन मिलता है कि भगवान विष्णु ने यहां एक कुंड का निर्माण किया था. इसी तथ्य का उल्लेख मत्स्य पुराण में भी है, जहां मणिकर्णिका को पांच पवित्र जल-स्थलों में से एक बताया गया है.













