
हमारे 'एंटीबायोटिक-प्रेम' ने तैयार कर दी है सुपरबग की फौज, नई महामारी की ओर बढ़ता देश
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जरा-सा बुखार हुआ, गला खराब हुआ या दो दिन खांसी चली, और हम नतीजे तक पहुंच गए कि 'चलो, एंटीबायोटिक ले लेते हैं.' भारत में बीमारी की पहचान बाद में होती है, दवा पहले तय हो जाती है. हमारा 'एंटीबायोटिक प्रेम' एक महामारी बनता जा रहा है, जिसका जिक्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'मन की बात' कार्यक्रम में किया है.
शहरों में आम मान्यता है कि वो डॉक्टर, डॉक्टर ही क्या जो एंटीबायोटिक न प्रिस्क्राइब करे... स्पेशलिस्ट डॉक्टर वही है जो अगले दिन बीमारी रफूचक्कर कर दे... और थोड़ा गांवों की तरफ जाएं तो पता चलेगा कि यदि डॉक्टर ने पानी (सलाइन) नहीं चढ़ाया तो मतलब उसने ठीक से इलाज नहीं किया... इन मान्यताओं के पीछे हर शख्स के भीतर बैठा 'डॉक्टर' जिम्मेदार है. जो पहले घरेलू इलाज करता है और जब बात नहीं बनती तो किसी फार्मेसी वाले की ओर चल देता है. इलाज की ये खोज 90 फीसदी मामलों में डॉक्टर के पास जाने से पहले ही खत्म हो जाती है. और यही, इस समस्या का सबसे खतरनाक पहलू है.
रविवार को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मन की बात में एंटी-माइक्रोबियल रेजिस्टेंस पर चिंता जताते रहे थे, तो उसमें कोई सीक्रेट नहीं था. वो सीधे-सीधे हमारी गलत आदतों की ओर इशारा था. क्योंकि अगर भारत आज एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस के सबसे खतरनाक दौर में पहुंच रहा है, तो उसके पीछे सिर्फ ढीले कानून या कमजोर सिस्टम नहीं, बल्कि मरीज के तौर पर हम खुद भी जिम्मेदार हैं.
एक मरीज की आदतों का सफर...
दिल्ली के 11 जिलों में किए गए एक सर्वे ने इलाज को लेकर हमारे सतही रवैये को उजागर किया है. होता यह है कि जब घरेलू उपचार काम नहीं करता है, तो दवा के लिए पहला कॉन्टेक्ट पर्सन फार्मेसी वाला ही होता है. लोग बीमार होते ही सबसे पहले डॉक्टर नहीं, दवा दुकान खोजते हैं. पर्ची की जरूरत नहीं पड़ती. नाम लेकर दवा मिल जाती है. 'यही तो पिछली बार ली थी.' 'यही जल्दी ठीक करती है.' हमें फर्क नहीं पड़ता कि बीमारी वायरल है या बैक्टीरियल. हमें यह भी नहीं जानना कि एंटीबायोटिक वायरस पर काम ही नहीं करती. हमें बस जल्द ठीक होना है, बाकी सब विज्ञान जाए भाड़ में.
दो दिन में हालत बेहतर होती है, और हम खुद को सही साबित मान लेते हैं. दवा छोड़ देते हैं. कोर्स पूरा करना हमें फिजूल लगता है. हम यह जानना ही नहीं चाहते कि अधूरा कोर्स बैक्टीरिया को मारता नहीं, उन्हें ट्रेनिंग देता है. उन्हें सिखाता है कि अगली बार इस दवा से कैसे बचना है.
ऐसे ही हम अपने शरीर में ऐसे कीटाणु पैदा करते हैं जिन पर कल की दवाएं बेअसर होंगी. और ये ताकतवर कीटाणु कहलाते हैं 'सुपरबग'. इस तरह हमारा सेल्फ-मेडिकेशन सबके लिए खतरा बनना शुरू हो जाता है.

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