
सालों से पड़ोसी देशों में रहते सीरियाई नागरिक राजनैतिक भूचाल के बीच कर रहे घर वापसी, क्या है वजह?
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सीरिया में विद्रोहियों ने राजधानी दमिश्क पर कंट्रोल कर लिया, जबकि राष्ट्रपति बशर अल-असद देश छोड़कर जा चुके हैं. इसके बाद से जॉर्डन और लेबनान समेत तमाम देशों से शरणार्थी अपने मुल्क वापस लौट रहे हैं. यूनाइटेड नेशन्स के डेटा के अनुसार, दुनियाभर में सबसे ज्यादा शरणार्थियों में एक सीरियाई रिफ्यूजी हैं. ऐसा क्या हुआ, जो उन्हें देश छोड़ना पड़ा और अब वे क्यों वापस लौट रहे हैं?
सीरियाई सेना और विद्रोहियों के बीच लगभग दो हफ्ते से चली आ रही जंग नए नोट पर थम चुकी. विद्रोहियों के राजधानी समेत तमाम बड़े शहरों पर कब्जे के साथ ही राष्ट्रपति बशर अल-असद ने देश छोड़ दिया. एक तरफ खुद राष्ट्रपति रूस में शरण लिए हुए हैं, दूसरी तरफ पिछले सालों में देश छोड़कर पड़ोसी देशों की शरण लिए हुए सीरियाई नागरिक अपने देश लौट रहे हैं. पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा रिफ्यूजी इसी देश से हैं.
क्यों छोड़ना पड़ा देश
साल 2011 में सीरिया में गृह युद्ध शुरू हुआ. लड़ाई विद्रोही समूहों और असद सरकार के बीच थी. सरकार विरोधी गुटों का कहना था कि वे महंगाई, करप्शन के खिलाफ हैं. पहले सड़कों पर आंदोलन शुरू हुआ, जिसे अरब स्प्रिंग कहा गया. जल्द ही इसमें मिलिटेंट्स शामिल हो गए, जिन्हें विदेशी ताकतों का सपोर्ट था. हालात बिगड़ने लगे. पहले तो सीरियाई नागरिक अपने ही देश में विस्थापित होने लगे. जल्द ही वहां भी असुरक्षा बढ़ने पर वे पड़ोसी देशों की शरण लेने लगे. और फिर वे यूरोप और अमेरिका तक चले गए. पांच सालों से ज्यादा चली लड़ाई में शरणार्थियों ने देश लौट सकने की उम्मीद खो दी थी लेकिन अब असद सरकार के गिरने के साथ वे दोबारा लौट रहे हैं.
किन देशों की शरण ली यूनाइटेड नेशन्स हाई कमिश्नर फॉर रिफ्यूजीज की मानें तो सीरिया के भीतर ही 7 मिलियन से ज्यादा नागरिक विस्थापित हैं, जबकि लगभग इतने ही लोग दूसरे देशों में शरण ले चुके. इनमें से तुर्की में सबसे ज्यादा लगभग साढ़े तीन करोड़ सीरियाई शरणार्थी हैं. इसके बाद लेबनान, जॉर्डन, जर्मनी और फिर ईराक है. इनमें से लगभग सारे ही मिडिल ईस्टर्न देश लगातार सीरिया के मामले में मध्यस्थता करने की कोशिश करते रहे ताकि उनके अपने देश से रिफ्यूजियों की आबादी घट सके. अब पड़ोसी देशों से उनकी वापसी शुरू हो चुकी है.
अब क्यों लौट रहे अपने देश ज्यादातर देशों में शरणार्थियों को लेबर मार्केट में औपचारिक एंट्री नहीं है. वे काम तो कर रहे हैं लेकिन छुटपुट या फिर थर्ड पार्टी के जरिए. सरकारी कामों या बड़े कामों से योग्यता के बाद भी उन्हें दूर रखा जाता है. अगर वे लेबर फोर्स में शामिल होना चाहें तो इसकी सजा भी है. मसलन, लेबनान वैसे तो सीरिया का मददगार है लेकिन अपने यहां शरण देने वालों के सामने उसने शर्त रख दी कि वे तभी अपना शरणार्थी स्टेटस रिन्यू करवा सकते हैं, जब वे वर्कफोर्स से दूर रहें. द गार्जियन की रिपोर्ट के अनुसार, इसके लिए उनसे बाकायदा दस्तखत करवाया जाता है.

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