
संवाद का जरिया,आइडेंटिटी या राजनीति का हथियार...? भाषा विशेषज्ञों ने ऐसे सुलझाई 'लैंग्वेज वार' की गुत्थी
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नई शिक्षा नीति में तीन भाषा फॉर्मूला ने बच्चों, माता-पिता और शिक्षाविदों के बीच बहस का माहौल बना दिया है. हिंदी थोपने की आशंका, अंग्रेजी पर जोर और भाषाई पहचान के सवाल को लेकर इंडिया टुडे कॉनक्लेव के सेशन में चर्चा हुई. इसमें भाषाविदों ने बताया कि कैसे भाषा ने अपनी जर्नी पूरी की और आज कैसे भाषा एक अलग तरह से अपनाई जा रही है.
देखा जाए तो भाषा महज संवाद का जरिया है. मगर इसके दूसरे पहलू भी हैं. भाषा ही कभी-कभी हमारी पहचान या राजनीति का हथियार भी बनते देखी गई है. इंडिया टुडे कॉनक्लेव मुंबई के मंच पर इसी ‘हॉट बटन’ पर चर्चा हुई. जिसमें जेएनयू के प्रोफेसर अजय गुडावर्ती और प्रोफेसर नरेंद्र जाधव ने ‘द लैंग्वेज वार: द आर्ट ऑफ आइडेंटिटी अर्सेसशन’ सत्र में अपनी राय रखी.सेशन को इंडिया टुडे की सीनियर एडिटर मारिया शकील और मुंबई तक के एडिटर साहिल जोशी ने मॉडरेट किया.
अर्थशास्त्री प्रो. नरेंद्र जाधव ने सेशन की शुरुआत करते हुए कहा कि भारत में भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं रह गई है. प्रो जाधव शिक्षा विशेषज्ञ, लेखक और पूर्व राज्यसभा सदस्य हैं जिन्होंने भाषा, शिक्षा और सामाजिक पहचान पर गहरी रिसर्च की है. उन्होंने आगे कहा कि आज स्थिति इतनी बदल चुकी है कि किसी भी भाषा से किसी दूसरी भाषा में रियल टाइम ट्रांसलेशन संभव हो गया है. पुणे में ही ऐसे उपकरण बने हैं जो 370 भाषाओं का एक-दूसरे में अनुवाद कर सकते हैं.
कम उम्र में तीन भाषाओं का बोझ डालना ठीक नहीं
क्या बच्चों पर इतनी भाषाई बोझ डालना सच में ज़रूरी है या ये केवल राजनीति और सांस्कृतिक पहचान का मामला बन गया है? इस सवाल पर प्रो जाधव ने कहा कि हर भाषा अपनी संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती है और भारत की भाषाई विविधता उसकी सबसे बड़ी ताकत है. वर्तमान बहस का केंद्र हिंदी को शुरुआती कक्षाओं में तीसरी भाषा के तौर पर पढ़ाने को लेकर है. उन्होंने बताया कि कोठारी कमीशन, 1986 की नीति और 2020 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) में तीन-भाषा फॉर्मूला का सुझाव दिया गया था लेकिन इसे कहीं भी जबरदस्ती लागू करने का निर्देश नहीं था.
महाराष्ट्र का उदाहरण देते हुए जाधव ने बताया कि यहां तीन-भाषा फॉर्मूला अभी भी लागू है. इसमें मराठी, हिंदी और अंग्रेजी है लेकिन हिंदी केवल 5वीं कक्षा से शुरू होती है. 2020 में NEP (नेशनल एजुकेशन पॉलिसी)के बाद महाराष्ट्र सरकार ने डॉ. मसिलकर की अध्यक्षता में समिति बनाई जिसने 2021 में सुझाव दिया कि कक्षा 1 से 12 तक तीनों भाषाएं अनिवार्य हों. जाधव ने कहा कि उस समय इस पर कोई बहस नहीं हुई लेकिन जब इसे लागू करने की कोशिश हुई तो मराठी संगठनों और राजनीतिक पार्टियों ने विरोध किया. इसके बाद मुख्यमंत्री ने पुराने जीआर को वापस लिया और नई समिति बनाई, जिसका अध्यक्ष मैं खुद हूं.
उन्होंने स्पष्ट किया कि असली समस्या हिंदी का थोपना नहीं, बल्कि बहुत कम उम्र में तीन भाषाओं का बोझ डालना है. शिक्षा विशेषज्ञ भी मानते हैं कि शुरुआत में मातृभाषा ही सबसे अच्छा माध्यम है. अगर शुरू से तीन भाषाएं पढ़ाई जाएं तो बच्चे किसी भी भाषा को ठीक से सीख नहीं पाते.

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