
संघ के 100 साल: गुरु का आदेश मतलब प्रभु की इच्छा, फिर 36 साल गोलवलकर ने नहीं कटवाए बाल
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गोलवलकर जब पहली बार एक आश्रम आए तो उन्हें अगली ही सुबह अपने गुरु से कटू वचन सुनने पड़े. देर तक सोने पर उनके गुरु ने कहा था-ऐसा सोता आदमी जीवन में क्या हासिल कर पाएगा, गुरु की इस टिप्पणी ने गोलवलकर की आंखे खोल दी. उन्हें आज अपने आलस्य पर सचमुच क्रोध आ रहा था. उन्होंने बदलाव करने की ठान ली थी. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है उसी घटना का वर्णन.
आश्रम में ये उनकी पहली सुबह थी. स्वामी अखंडानंद सुबह 4 बजे ही उठ जाते थे. उन्होंने एक शिष्य रघुवीर से पूछा गोलवलकर कहां हैं? रघुवीर का जवाब था- वो अभी सो रहा है. स्वामी का जवाब था या सवाल था, “ऐसा सोता आदमी जीवन में क्या हासिल कर पाएगा”. जब माधव को जगाकर रघुवीर ने ये वाकया बताया तो उनकी हालत देखने लायक थी, पहले ही दिन ऐसा व्यंग्यात्मक वचन. माधव को अपने आलस पर बहुत ही गुस्सा आया, मन में प्रण किया कि आगे से ऐसा नहीं होने दूंगा.
स्वामी अखंडानंद यानी गुरु गोलवलकर के गुरु, जिनसे उन्होंने संन्यास और ब्रह्मचर्य की दीक्षा ली थी स्वामी विवेकानंद के गुरु भाई थे. कभी के गंगाधर घटक और बाद के अखंडानंद. रामकृष्ण मिशन के तीसरे अध्यक्ष थे, लेकिन स्वामी विवेकानंद की उक्ति कि निर्धन को भगवान मानो, को मन से बांध लिया था. अध्यक्ष बनने के बाद भी मिशन के मुख्यालय बेलूर मठ कभी कभी ही जाते थे. बंगाल के अंदरूनी ग्रामीण इलाके के अपने सारागाछी आश्रम में ही रहना पसंद करते थे. उनके देसी विदेशी भक्त उनसे यहीं मिलते आते थे. ऐसे में माधव यानी गुरु गोलवलकर ने जब डॉ हेडगेवार को बिना बताए 1936 में उनका साथ छोड़ा तो वो सीधे यहीं आए. माधव लगातार नागपुर के रामकृष्ण मिशन में जाते रहते थे. लेकिन अब दीक्षा लेने की चाह थी, उसे वो स्वामी अखंडानंद से ही लेना चाहते थे.
जब गुरु गोलवलकर को दिया गया बर्तन सफाई और मंदिर धुलाई का काम
लेकिन पहले दिन ही स्वामीजी की नजरों में आ गए, यूं स्वामीजी की नजर आश्रम के हर सदस्य पर बराबर रहती थी, वो संन्यासियों के लिए कठोर नियमों के समर्थक थे. स्वामीजी किसी को भी खाली बैठे नहीं देख सकते थे और जिसको जो काम दिया, उसकी निगरानी भी रखते थे. कुछ दिन बाद अश्विनी अमावस्या और काली पूजा का दिन था, उन्होंने पूजा के दौरान जितने धार्मिक रीति रिवाज क्रियाएं होती हैं, उनकी जिम्मेदारी अपने शिष्य विभूति चैतन्य को सौंपी और उसकी तैयारियों की जिम्मेदारी माधव को दे दीं.
स्वामीजी इस साल सब धूमधाम से करना चाहते थे, क्योंकि साल 1936 उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस का शताब्दी वर्ष था. माधव का काम था कि पूजा के लिए सब कुछ तैयार रखना, और पूजा के बाद सब कुछ हटाकर जगह साफ करना. इसमें रसोई के बर्तनों को साफ करने से लेकर मंदिर की धुलाई तक शामिल थी. उन्होंने मन से वो सब किया.
मंगल आरती के बाद एक दिन स्वामी अखंडानंद जी ने सामान्य तौर पर जब सबको ये कहा कि, “पूजा से जुड़े सारे काम सच्ची पूजा माने जाते हैं. उन सबको पूरे मन से करना चाहिए, चाहे वो फूल चुनना हो, पूजा कक्ष को झाड़ू लगाना हो, फर्श को धोना हो, बर्तनों को साफ करना हो, फलों का इंतजाम करना हो, सभी काम करते वक्त मंत्र पढ़ते रहना चाहिए और अपने हृदय में भगवान को रख उनके बारे में ही सोचते रहना चाहिए”. तो गुरु गोलवलकर ने मान लिया कि वो अप्रत्यक्ष रूप से उनकी ही तारीफ कर रहे हैं.

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