
संघ के 100 साल: केरल में संघ स्वयंसेवकों का सबसे ज्यादा खून बहा, जानिए RSS की 'द केरला स्टोरी'
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म्यांमार में जन्मे भास्कर राव कलंबी वो शख्स थे जिन्हें केरल में संघ की शाखाओं के विस्तार का श्रेय जाता है. शुरूआत में उन्होंने केरल की निर्धन मछुआरों की बस्तियों में रात्रि शाखाएं लगाने से की. उनमें लगातार बढ़ती संख्या को देखकर कम्युनिस्ट परेशान होने लगे और फिर शाखाओं पर हमला होने लगा. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है यही कहानी.
एक बार जब गुरु गोलवलकर केरल की यात्रा पर थे, कुछ किशोर स्वयंसेवकों ने उनकी उपस्थिति में एक खेल खेला. बाद में उन्होंने एक स्वयंसेवक से पूछा, ‘इस खेल का नाम क्या है?’ लड़के ने जवाब दिया, 'दीपक बुझाना'. इस पर गुरु गोलवलकर ने एक बड़े स्वयंसेवक से पूछा, ‘क्या लड़के ने सही नाम बताया?’ जब उसने हां में उत्तर दिया, तो गुरु गोलवलकर ने कहा, '’किसी भी खेल का नाम ऐसा नहीं होना चाहिए. हमारी संस्कृति में दीपक बुझाना अशुभ माना जाता है. यहां हम कहते हैं कि ज्ञान का दीपक चमकता रहे. खेलों में भी नाम ऐसे होने चाहिए जो अच्छे संस्कार पैदा करें,’’ बेझिझक कहा जा सकता है कि अगले ही दिन खेल का नाम बदलकर 'चैलेंज या चुनौती' कर दिया गया. लेकिन गुरु गोलवलकर के ये तेवर बताते हैं कि संघ के केरल में विस्तार को लेकर उनका रुख क्या था और क्यों संघ ने केरल में ही सबसे ज्यादा प्रचारकों-स्वयंसेवकों का खून बहाया. गुरु गोलवलकर समझ चुके थे कि विदेशी भाषा, विचार हो या सम्प्रदाय, असर सोच, संस्कारों और संस्कृति पर पड़ती है. उस वक्त हालात ऐसे थे कि अगर कोई हिंदू किसी चाय की दुकान पर बैठकर अगर चाय पी रहा होता था, तो ईसाई या मुसलमान के आने पर उसे उठना पड़ता था. 1905 में ही ईसाइयों ने केरल में 105 मंदिर तोड़े थे. दत्तोपंत ठेंगड़ी ने रखी नींव
केरल में सबसे पहले जिस प्रचारक के पांव पड़े थे, वो थे दत्तोपंत ठेंगड़ी. बचपन से ही नागपुर में दत्तोपंत संघ की शाखा में भी जाया करते थे. ऐसे में मोरोपंत पिंगले उनके सहपाठी थे और शाखा के मुख्य शिक्षक भी, सो उनके सानिध्य में रहते रहते संघ के तीनों शिक्षा वर्ग भी कर लिए. उनको डॉ हेडगेवार से भी मिलने, बात करने का इस दौरान अवसर मिला. जब 1942 में गुरु गोलवलकर ने युवाओं से आव्हान किया कि संघ को कुछ साल दें, प्रचारक बनकर निकलें, तो असर दत्तोपंत ठेंगडी पर भी पड़ा. उनको 22 मार्च 1942 को केरल में कालीकट (कोझिकोड) का प्रचारक बनकर भेज दिया गया. वहां के राजपरिवार का सहयोग मिला और उन्होंने चलप्पुरम में पहली शाखा स्थापित की.
तीन साल में उन्होंने संघ का काफी कार्य उस दुर्गम क्षेत्र में खड़ा कर दिया, तो 1945 में उन्हें वहां से कलकत्ता भेज दिया गया. उनका काम देखकर 1948 में उन्हें बंगाल के साथ साथ असम प्रांत का प्रचारक भी बना दिया गया. ये वो दौर था, जब गांधी हत्या के बाद संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया था. ऐसे में दत्तोपंत को भी वापस आना पड़ा था. बाद में इन्हीं दत्तोपंत ठेंगड़ी ने मजदूर संघ, स्वदेशी जागरण मंच, अधिवक्ता परिषद जैसे कई संगठन संघ के अंदर खड़े कर दिए. एक बार 82 साल की उम्र में 2002 में वे किसी बैठक में भाग लेने फिर कालीकट (कोझिकोड) आए. केरल के स्वयंसेवकों में बड़ा उत्साह था, दो युवा स्वयंसेवक उनसे मिलने को आतुर थे. आखिर केरल में संघ की नींव रखने वाले महामानव का दर्शन ही उनके लिए विरला था.
भारतीय मजदूर संघ के क्षेत्रीय संगठन मंत्री सीवी राजेश लिखते हैं, “सुबह-सुबह वे कार्यालय की ऊपरी मंज़िल के बड़े हाल में टहल रहे थे. स्वयंसेवकों ने सोचा कि उनकी चाल में बाधा न बने, इसलिए वे चुपचाप प्रतीक्षा करते रहे. ठेंगड़ी जी ने उनकी ओर देखा. तब वे साहस जुटाकर आगे बढ़े और ‘नमस्ते’ कहा. ठेंगड़ी जी ने भी मुस्कुराते हुए ‘नमस्ते’ कहा. वे स्वयंसेवक अपनी जानी-पहचानी गैर-मलयालम भाषा में शीघ्रता से अपना परिचय देने लगे. ठेंगड़ी जी ने कोई उत्तर नहीं दिया, चलना रोक दिया और हॉल से अपने कमरे में चले गए. इस अप्रत्याशित घटना से स्वयंसेवक उदास हो गए. उन्होंने एक-दूसरे की ओर देखा और मन ही मन सोचा, ‘शायद उन्हें अच्छा नहीं लगा कि हमने उनके टहलने के बीच में जाकर परिचय कराया...’ लेकिन यह विचार मन से निकला ही नहीं था कि ठेंगड़ी जी कमरे से बाहर आते दिखाई दिए — दोनों हाथों में एक-एक फाइबर की कुर्सी उठाए हुए. स्वयंसेवक अपनी गलती पर लज्जित होकर तुरंत आगे बढ़े और कुर्सी लेने की कोशिश की, पर उन्होंने देने से मना कर दिया. वहां रखी एक कुर्सी के पास उन दो कुर्सियों को रखकर उन्होंने स्वयंसेवकों को बैठने का आग्रह किया. लगभग 20 वर्ष के उन युवा कार्यकर्ताओं से बात करने के लिए 82 वर्ष के उस वृद्ध प्रचारक ने स्वयं कुर्सियाँ उठाकर लाना उचित समझा”. ऐसे थे ठेंगड़ी जी. रंगून में जन्मे भास्कर अन्ना ने खड़ी की शाखाओं की श्रृंखला
शुरूआत में केरल में शाखाओं के विस्तार का सबसे ज्यादा श्रेय दिया जाता है रंगून (म्यांमार) के पास टिनसा नगर में 1919 में जन्मे भास्कर राव कलंबी को. उनके पिता शिवराम कलंबी वहां चिकित्सक थे, सो उनकी शुरूआती शिक्षा भी वहीं हुई थी. पिता बम्बई (अब मुम्बई) आए तो भास्कर भी साथ आए. वहां उनकी मुलाकात बम्बई के प्रथम प्रचारण गोपालराव येरकुंटवार से हुई. ये 1935 की बात है, भास्कर वहां शिवाजी उद्यान शाखा में जाने लगे. डॉ हेडगेवार बम्बई आए तो भास्कर उनसे ज्यादा से ज्यादा बात करते थे, उनकी सेवा करते थे. डॉ हेडगेवार का ऐसा प्रभाव भास्कर पर पड़ा कि 1940 तक वो तीसरा संघ शिक्षा वर्ग कर चुके थे. उसी साल डॉ हेडगेवार का अंतिम बौद्धिक हुआ था. हालांकि प्रचारक वे पढ़ाई पूरी करने के बाद ही बने, तब तक बम्बई नगर में एक विभाग के कार्यवाह रहे, लेकिन जैसे ही 1945 में वकालत की परीक्षा पास की, उन्हें प्रचारक बना दिया गया और जिम्मेदारी दी गई केरल में कोच्चि की.
सबसे पहले उन्होंने खुद को केरल के रंग में ढाला, कोई उन्हें देखकर अनुमान नहीं लगा सकता था कि वो मलयाली नहीं है. 1964 में जब केरल अलग प्रांत बना तो उनको उसके पहले प्रांत प्रचारक की जिम्मेदारी दी गई. 1982 तक केरल ही उनका कार्यक्षेत्र रहा. उन्हें बखूबी पता था कि ईसाई और मुस्लिम कट्टर गुट संघ के काम को आसानी से यहां खड़ा नहीं होने देंगे, लेकिन वो बाधाओं के आगे हार मानने वालों में से नहीं थे. शुरूआत उन्होंने केरल के निर्धन मछुआरों की बस्तियों में रात्रि शाखाएं लगाने से की. उनमें लगातार बढ़ती संख्या को देखकर कम्युनिस्ट परेशान होने लगे और फिर शाखाओं पर हमला होना, हिंसक घटनाएं होना और अक्सर स्वयंसेवकों का जान गंवा देना.. धीरे धीरे आम हो गया.

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