
संघ के 100 साल: ऐसे हुई थी 'सेवा भारती' की स्थापना, पीएम मोदी से भी जुड़ता है एक लिंक
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दिल्ली का तिमारपुर. एक पिछड़ी बस्ती में अपनी नौकरी छोड़ चुका एक इंजीनियर बच्चों को अंग्रेजी, गणित और विज्ञान पढ़ा रहे थे. इन बच्चों के नतीजे बहुत अच्छे थे. इंजीनियरिंग की नौकरी छोड़ने वाले ये शख्स विष्णुजी थे. सेवा भारती की बुनियाद में विष्णुजी का अहम योगदान है. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है वही कहानी.
जब पूरा देश आपातकाल में लगने वाली पाबंदियों से त्रस्त था, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े कई नेता प्रतिबंध के चलते या तो जेल में थे या फिर भूमिगत रहकर आंदोलन को दिशा दे रहे थे, उसी समय संघ प्रमुख बालासाहब देवरस एक नए संगठन की योजना बना रहे थे. ऐसा संगठन जिसका ना कोई राजनैतिक उद्देश्य हो और ना ही कोई उस पर इस तरह का आरोप ही लगा सके. 21 मार्च 1977 को आपातकाल हटाकर इंदिरा गांधी सरकार ने चुनाव करवाने का ऐलान किया और इधऱ संघ के दिल्ली के स्वयंसेवक दिल्ली गेट के पास फुटबॉल स्टेडियम में एक सभा में जुटे थे.
उस सभा में बालासाहब ने कहा कि, “संघ एक ऐसा समरस समाज विकसित करना चाहता है, जहां किसी के साथ जाति के आधार पर भेदभाव नहीं होगा. समरस एवं समृद्ध समाज भाषणों या नारों से नहीं बनाया जा सकता. ऐसे समाज के निर्माण के लिए एक कठिन तपस्या की आवश्यकता है. जातिगत भेदभाव तथा अस्पृश्यता हमारे समाज के घातक रोग हैं. अब समय आ गया है कि स्वयं कृष्ण को सुदामा के घर जाना होगा. स्वयं जाकर समस्याओं तथा कमियों को समझना होगा, उनका निदान करना पड़ेगा.”
बहुत कम लोगों को पता है कि नागपुर में संघ से जुड़ने के बाद बालासाहब देवरस ने दो साल तक एक अनाथालय में पढ़ाया था. उनके पड़ोसी भी कई पिछड़े परिवार थे, सो शुरुआत से ही उनकी परेशानियां समझते थे. कैसे कोई गरीब आर्थिक या सामाजिक स्थिति बेहतर करे, इसकी उनके मन में योजनाएं चलती रहती थीं. संघ भी तमाम संगठनों के जरिए ऐसे सेवा के कार्यक्रम चला रहा था. कुष्ठ आश्रम, वनवासी कल्याण आश्रम जैसे संगठन खड़ा करना उसी प्रक्रिया का हिस्सा था. युद्ध की परिस्थितियां हों, विभाजन या युद्ध के शरणार्थी हों, संघ की भूमिका की तारीफ उसको ना चाहने वालों ने भी दिल खोलकर की है. लेकिन बालासाहब देवरस को लगता था ये पर्याप्त नहीं है. एक संगठन ही ऐसा होना चाहिए, जिसका काम ही सेवा के प्रकल्प चलाना हो. सेवा भारती से शुरुआती दिनों से ही जुड़े रहे मायाराम पतंग पांचजन्य में एक लेख में बताते हैं कि, “उन दिनों दिल्ली, हरियाणा प्रांत के प्रांत प्रचारक थे अशोक सिंहल और दिल्ली के प्रचारक थे विश्वनाथ. स्वयंसेवक सेवा क्षेत्र में कैसे जाएं, इस पर इन दोनों ने गहन विचार-विमर्श किया. इस विचार को मूर्त रूप देने के लिए अशोक सिंघल ने कानपुर में प्रचारक का दायित्व निभा रहे विष्णु कुमार को दिल्ली बुलाया. आदेश मिलते ही विष्णु जी अपने काम में लग गए. वे झंडेवाला कार्यालय में कक्ष क्रमांक 13 में रहकर सेवा कार्यों का ताना-बाना बुनने लगे. पहले प्रत्येक जिले के प्रौढ़ प्रमुख की जगह सेवा प्रमुख तय किए गए. फिर सबके साथ विष्णु जी ने बैठक की. विष्णु के सहयोगी के रूप में श्रवण कुमार को रखा गया. उन दिनों मुझे भी नवीन शाहदरा जिले का सेवा प्रमुख बनाया गया था”. एक इंजीनियर जो नौकरी छोड़कर सेवा के लिए समर्पित हो गया
सवाल है कि कौन थे विष्णु जी? भले ही आशीर्वाद और विचार बालासाहब देवरस का हो लेकिन प्रचलन में सेवा भारती का संस्थापक इन्हीं विष्णु कुमार को माना जाता है. 5 मई, 1933 को कर्नाटक के बेंगलुरु के पास चिकवल्लापुरम नगर में जन्मे विष्णुजी अपने छह भाई-बहनों में सबसे छोटे थे. वे बचपन से ही स्वयंसेवक रहे और 1962 में मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक की उपाधि प्राप्त करने के बाद प्रचारक बन गए. कहा जाता है कि दो भाई संघ में प्रचारक बने तो दो भाई रामकृष्ण मिशन में संन्यासी हो गए थे. उन्होंने अधिकतर अलीगढ़, पीलीभीत, लखीमपुर, काशी, कानपुर, दिल्ली और भोपाल में सेवा की. आपातकाल के दौरान उन्होंने अशोक सिंघल के साथ काम किया. कानपुर में आपातकाल के दौरान वे 'मास्टरजी' के नाम से लोकप्रिय थे. उन्होंने सत्याग्रह में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. हिन्दी न जानने से उन्हें प्रारम्भ में कुछ कठिनाई भी हुई. पश्चिम उत्तर प्रदेश में श्रावण मास में बनने वाली मिठाई ‘घेवर’ को ‘गोबर’ कहना जैसे अनेक रोचक संस्मरण उनके बारे में प्रचलित हैं.
1978 में वे प्रौढ़ शाखाओं की जिम्मेदारी संभालने के लिए दिल्ली आए. लेकिन बाद में तत्कालीन सरसंघचालक बालासाहेब देवरस के आह्वान पर उन्होंने स्वयं को सेवा भारती के अंतर्गत चलाए जाने वाले सेवा कार्यों के लिए समर्पित कर दिया. 1995 में उनका तबादला भोपाल हो गया, जहां उन्होंने सेवा भारती के कार्यों को क्षेत्र के दूरस्थ क्षेत्रों तक भी विस्तारित किया. आज अकेले मध्य क्षेत्र में छह मातृछाया केंद्र, 21 छात्रावास और हजारों एकल विद्यालय हैं और यह सब विष्णु जी के अथक प्रयासों के कारण ही संभव हो पाया है.
सभी प्रौढ़ शाखाओं को सेवाभावी स्वयंसेवकों का चयन करके सेवा प्रमुखों से संपर्क करने का निर्देश दिया गया. इसके बाद विष्णु जी ने सभी को अपनी पहुंच, अपने विचार तथा अपने साधनों से अपने क्षेत्र में सेवा कार्य स्वयं करने को कहा. सभी सेवा प्रमुखों ने अलग-अलग प्रकार के कार्य किए. किसी ने पिछड़ी बस्तियों में सफाई अभियान चलाया, तो किसी ने लंगर लगाया. किसी ने निर्धन छात्रों को पुस्तक, कॉपियां देकर उनकी सेवा की. कई लोग अस्पतालों में फल, दवा आदि वितरित करने गए तो किसी ने स्कूलों में निर्धन बच्चों को स्वेटर बांटे. इस बीच विष्णु जी सबसे संपर्क करते रहे और आवश्यक परामर्श देते रहे. और विष्णुजी बन गए कोचिंग गुरु

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