
संघ के 100 साल: अगर डॉ हेडगेवार पर वो रिवॉल्वर मिल जाती तो संघ नागपुर में ही खत्म हो जाता
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आजादी के दौर में संघ ने कई क्रांतिकारियों को गुप्त रूप से खूब सहयोग किया था. इस चक्कर में एक बार तो डॉ हेडगेवार पर ऐसा केस चल सकता था कि उन्होंने संघ के लिए जो सपने देखे थे वो अधूरे ही रह जाते. आरएसएस के 100 साल की इन 100 कहानियों में एक कहानी ये भी है.
आजादी के दौर में संघ ने कई क्रांतिकारियों को गुप्त रूप से खूब सहयोग किया था. चंद्रशेखर आजाद और भगतसिंह के एक साथी की मदद करने के चक्कर में तो डॉ हेडगेवार पर ऐसा केस चल सकता था कि उन्होंने संघ के लिए जो सपने देखे थे वो अधूरे ही रह जाते. आरएसएस के 100 साल की इन 100 कहानियों में एक कहानी ये भी है. आजादी के बाद से ही भारत, महात्मा गांधी के अहिंसा के आह्वान और लगभग हर हिंदू देवी-देवता के हाथों में अस्त्र-शस्त्र की परिकल्पना के बीच झूलता रहा है. ऐसे में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार की सोच स्पष्ट थी कि आत्मरक्षा और देश को आजादी दिलाने के लिए हथियार उठाने में कोई बुराई नहीं है. यही वजह रही कि कोलकाता में मेडिकल की पढ़ाई के दौरान ही डॉक्टर हेडगेवार अनुशीलन समिति जैसे क्रांतिकारी संगठन से जुड़ गए. संघ के स्वयंसेवकों को आत्मरक्षा हेतु दंड (लाठी) चलाने, नियुद्ध (जूडो-कराटे) आदि का प्रशिक्षण देने और विजयदशमी पर स्थापना के दिन शस्त्र पूजा की परम्परा शुरू करने में उनकी यही सोच उभरती है.
कई क्रांतिकारियों को आरएसएस गुप्त रूप से सहयोग करता आया था. सुखदेव ने भी अपनी फरारी के दिनों में डॉ. हेडगेवार की सहायता ली थी. लेकिन एक गदर क्रांतिकारी की सहायता उनको ऐसी भारी पड़ गई थी कि उस दिन खुद डॉ हेडगेवार ने कोशिश ना की होती, तो एक रिवॉल्वर के चलते वो लम्बे समय तक जेल में रहते और संघ के कई वरिष्ठ साथी भी. कांग्रेस से बहुत अलग था संघ का मकसद, पर क्रांतिकारियों को दी गुप्त मदद संघ के 100 साल के इतिहास में तमाम दिलचस्प कहानियां छुपी हुई हैं. डॉ हेडगेवार के समय में संघ का वो दौर था, जब उन्हें ना केवल नागपुर में संगठन खड़ा करना था, बल्कि महाराष्ट्र सहित मध्य प्रांत के कोने-कोने में इसे पहुंचाना था. लेकिन ये आसान नहीं था क्योंकि 1885 में शुरू हुई थी कांग्रेस और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शुरू हुआ था चालीस साल बाद. अपने शुरुआती 40 सालों में कांग्रेस ने एक बार भी आजादी की मांग नहीं की, बल्कि कोई करता भी था तो उसे चुप करवा दिया जाता था.
1920 के नागपुर अधिवेशन में डॉ हेडगेवार का ऐसा ही प्रस्ताव खारिज कर दिया गया था. लेकिन संघ को तो आजादी के बाद का भारत कैसे दुनिया का सबसे शक्तिशाली, समृद्ध देश बने, इस पर सोचना था. सो संघ ने तय किया कि दशकों तक चुपचाप काम करना है, केवल संगठन खड़ा करना है, कोई बड़ा आंदोलन उससे पहले शुरू नहीं करना है. कांग्रेस कोई आंदोलन करती थी तो स्वयंसेवकों को ये अनुमति थी कि वो उस आंदोलन में भाग लेने या ना लेने का निर्णय खुद ले सकते हैं. लेकिन क्रांतिकारियों को चुपचाप सहायता करने के मामले में संघ किसी भी हद तक जा सकता था. पहले साल में संघ की शाखाएं नागपुर में ही 18 हो गई थीं, लेकिन धन के लिए कोई व्यवस्था नहीं बन पा रही थी. ऐसे में उनकी सहायता एक ऐसे क्रांतिकारी मित्र ने भी की, जो अनुशीलन समिति के साथ काम करने के दौरान कलकत्ता में मिला था. पंजाब के गंगा प्रसाद पांडे, गदर क्रांति के अलावा चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह के एचएसआरए से भी जुड़े रहे. गंगा प्रसाद बीमार हुए तो होशंगाबाद में अपने छोटे भाई राम प्रसाद पांडे के आश्रम में आ गए, जो सालों से संन्यासी जीवन जी रहे थे. यहां ज्यादा तबीयत बिगड़ी तो गंगा प्रसाद वर्धा में गाय संरक्षण में जुटे अपने उस सबसे छोटे भाई आनंदी के पास आ गए, जो कभी क्रांतिकारियों के बीच संदेश पहुंचाने का काम करते थे. यहां गंगा प्रसाद भी साधु वेश में ही रहते थे. लेकिन थे तो क्रांतिकारी, सो रिवॉल्वर जैसे हथियार छुपा कर रखते थे. किसी मित्र ने उनकी रिवॉल्वर देख ली थी. एक दिन जब पास के रेलवे स्टेशन पर लूट की खबर छपी देखी तो उसमें लुटेरों पर एक रिवॉल्वर का जिक्र था. मित्र के पास जानकारी होने के चलते गंगा प्रसाद को पता था कि गड़बड़ हो सकती है, ऐसे में उनको डॉ हेडगेवार की याद आई. डॉ हेडगेवार मामले की गम्भीरता को समझते हुए उसी रात नागपुर से वर्धा के लिए रवाना हो गए औऱ रात साढे आठ बजे अप्पाजी जोशी के घर पहुंचे.
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डॉक्टर हेडगेवार ने कर दी थी अंग्रेजों के जासूस की पिटाई अप्पा जी उन दिनों मध्य प्रांत में कांग्रेस के सचिव थे और एआईसीसी के सदस्य भी थे. उनके घर भी सरकारी जासूस नजर रखे हुए थे. दोनों को इस बात का अंदाजा भी था. बावजूद इसके डॉ हेडगेवार जिद करके अप्पाजी जोशी को रात में ही गंगा प्रसाद के घर लेकर गए. खुद डॉ हेडगेवार उनके घर के करीब नीम के पेड़ के चारों तरफ बने एक प्लेटफॉर्म पर बैठ गए और अप्पाजी जोशी को उनसे हथियार लाने को भेज दिया. गंगा प्रसाद अपनी रिवॉल्वर लेकर खुद उनके साथ आ गए और डॉ. हेडगेवार के हाथ में पकड़ाई जो अचानक उनके हाथ से नीचे गिर गई, वो संभल पाते कि इतनी देर में अंधेरे में से एक व्यक्ति बाहर निकला और उनके हाथों को पकड़कर बोला कि ‘पकड़ लिया’. डॉक्टर हेडगेवार खतरा भांप चुके थे, उन्होंने फौरन रिवॉल्वर अप्पाजी जोशी की तरफ फेंकी और उस व्यक्ति पर हमला बोल दिया. दुबला पतला वो आदमी अचानक हुई इस पिटाई से घबरा गया और हाथ जोड़ने लगा कि मुझे माफ कर दो, मैं किसी से कुछ नहीं कहूंगा. तब तक अप्पाजी जोशी और गंगा प्रसाद पांडे वहां से भाग चुके थे. डॉक्टर हेडगेवार ने उस सरकारी जासूस को अपने दोनों हाथ दिखाए, कहा ‘मेरे हाथ खाली हैं, कुछ भी नहीं है’. तब तक वो जासूस खौफ में आ चुका था. उसके जाने के बाद डॉ हेडगेवार, मनोहर पंत के यहां पहुंचे. आनंदी पांडे की बीमारी का बहाना बनाकर, कुछ घंटे वहां रुके और वापस आ गए. हालांकि बाद में खुद की जासूसी को लेकर अप्पाजी जोशी की कलेक्टर से गहमागहमी और रेलवे स्टेशन लूट का खुलासा होने के बाद कलेक्टर ने भी उनकी जासूसी करवाना बंद कर दिया था. लेकिन ये उदाहरण है कि किस तरह कभी रास बिहारी बोस और भगत सिंह के साथी रहे क्रांतिकारी गंगा प्रसाद पांडे को बचाने के लिए डॉ हेडगेवार इस हद तक चले गए थे कि उन पर लूट और अवैध हथियार रखने दोनों की मुकदमा चलाकर सालों के लिए जेल भेजा जा सकता था. और ऐसे में आरएसएस तो नागपुर से बाहर जाए बिना ही संकट में पड़ जाता. लेकिन बाद में उन्हीं गंगा प्रसाद पांडे और उनके छोटे भाई आनंदी पांडे ने पंजाब में संघ की जड़ें मजबूत करने में एक बड़ी भूमिका निभाई थी.
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