
श्रीकृष्ण, कामदेव और अनंग त्रयोदशी... सनातन में वैलेंटाइन वाले प्रेम को किस नजरिए से देखते हैं ओशो और स्वामी विवेकानंद
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वैलेंटाइन तो बाद में आया होगा, लेकिन सनातन में अनंग त्रयोदशी नाम का एक व्रत उत्सव भी है, जो जीवन में प्रेम संबंधों में गहराई पाने के लिए किया जाने वाला व्रत है. मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को अनंग त्रयोदशी कहते हैं. अनंग कामदेव का ही एक नाम है. ओशो भी मानते हैं कि अध्यात्म में प्रेम को कभी ठुकराया नहीं गया है
बीता एक सप्ताह प्रेम के नाम रहा और आज वैलेंटाइन डे के साथ इसका समापन हो जाएगा, लेकिन प्रेम, प्यार, इश्क या मुहब्बत... आप कुछ भी कह लें, कोई भी नाम दे लीजिए, लेकिन सीने के अंदर जहां दिल धड़कता है उसी जगह से उठने वाला ये अहसास इतना दिव्य है कि इसे हर धर्म, पंथ, मत, मान्यता में सबसे ऊपर रखा गया है. संबंधों के आधार पर आप रिश्तों को अलग-अलग नाम दे सकते हैं, लेकिन उन रिश्तों और संबंधों को जिंदा रखनी वाली चेतना का नाम है प्रेम. प्रेम अगर एक अगन है तो त्याग व समर्पण इसके ईंधन हैं. ये दोनों रहेंगे तो प्रेम जिंदा रहेगा और नहीं रहे तो समझिए कि प्रेम कभी था ही नहीं.
वास्तविक पहचान कायम करता है प्रेम इंसानी जेहन में सबसे आसानी के साथ आने वाली जो पहली भावना है वह प्रेम है और ये किसी भी रूप में हो सकती हैं. पहले-पहल इसकी शुरुआत जिज्ञासा से हो सकती है, फिर आकर्षण आपको उसकी ओर लेकर जाता है, फिर आपमें ललक पैदा होती है, अगले चरण में वह आदतों में शुमार होकर आपकी पहचान बनने लगता है, फिर वह आपके जीवन का जरूरी हिस्सा बन जाता है और आपकी वास्तविक पहचान को कायम करता है और यहां से यह शाश्वत बन जाता है. इतना की आप न भी रहें, लेकिन प्रेम रहेगा. वह लोगों को याद रहेगा कि यह आपका प्रेम था. यही तो प्रेम के सात चरण हैं, जिन्हें बीती शताब्दियों में इतनी बार और ऐसे बताया गया है कि रहस्य न लगने वाली ये बात भी बड़ी रॉकेट साइंस बनकर उभरी है.
प्रेम को लेकर क्या कहते हैं ओशो? प्रेम में सुनी गईं दो सबसे खराब पंक्तियां कुछ ऐसी हैं. पहली तो ये कि 'प्यार अंधा होता है', दूसरी ये कि 'जब दिल लगा गधी से परी क्या चीज है.' इन दो खराब पंक्तियों ने प्रेम के रूप और इसके अर्थ को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया है. इनसे न तो सिर्फ प्रेम एक ऑब्जेक्ट में बदल गया है, बल्कि इसने सुंदरता के सबसे खराब पैमाने भी विकसित किए हैं और प्रेम की समझ को सबसे अर्थहीन और सबसे क्षुद्र बना दिया है.
इस पर ओशो तो लगभग डांटते हुए कहते हैं कि, 'भला ये क्या बात हुई कि प्यार अंधा होता है. ये तुमसे किसने कह दिया, किसने समझा दिया है. असल तो ये है कि सिर्फ प्यार की ही आंखें हैं, प्यार के बिना तो सब अंधा होता है.' जो लोग ऐसा कहते हैं असल में वह जानते ही नहीं कि, प्यार क्या है. बिना प्यार के इंसान बस एक शरीर है, एक मंदिर जिसमें देवता नहीं होते. प्यार के साथ देवता आ जाते है, मंदिर फिर और खाली नहीं रहता है.
आलिंगन संसार की सबसे सुंदर भाषा प्रेम न करने वाला अंधा होता है. जिसे न प्रेम नज़र आता है और न ही सामने वाले का उसके प्रति समर्पण. ओशो आगे कहते हैं कि, लोग तो ये भी कहते हैं कि प्रेम की कोई भाषा नहीं होती पर देखा जाये तो, आलिंगन संसार की सर्वोत्तम भाषा है. यह सिर्फ भाषा नहीं है, बल्कि चिकित्सा भी है.स्पर्श से बेहतरीन कोई अनुवाद नहीं है. आंखों से ज्यादा कोई नहीं बोलता. सबसे मुखर मौन संवाद होते हैं और फिर भी लोग कहते हैं. प्रेम की भाषा नहीं होती. आश्चर्य है ...'
ओशो को इसी बात को कई कवियों ने कविता का विषय बनाया है. कविवर मैथिलीशरण गुप्त लिखते हैं कि 'जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं, वह हृदय नहीं वह पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं' हालांकि उनकी दूसरी पंक्ति भले ही राष्ट्र प्रेम को समर्पित है, लेकिन वह इससे पहले हृदय को भावों से भरा होने और रसमय होना बता रहे हैं, जो प्रेम की अनुभूति है.'

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