
विशेष सत्र में फिर चौंकाएगी मोदी सरकार? जातिगत जनगणना की काट के लिए तैयार है 'ब्रह्मास्त्र'!
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2024 के महासमर के लिए सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच शह मात का खेल लगातार चल रहा है. संसद के विशेष अधिवेशन को लेकर तमाम तरह की अटकलें चल रही हैं. क्या विपक्ष के जातिगत जनगणना की मिसाइल को रोकने के लिए एनडीए सरकार अपना ब्रह्मास्त्र तैयार कर रही है?
जिस दिन से संसद के विशेष सत्र की घोषणा हुई है, कई तरह की राजनीतिक अटकलें लगाई जा रही हैं. राजनीतिक गलियारों में हर उस मुद्दे पर चर्चा हो रही है, जिससे सत्ता पक्ष की एनडीए सरकार अगले चुनावों में इंडिया गठबंधन को चुनौती दे सके. जिन मुद्दों की सबसे अधिक चर्चा है उनमें से एक देश-एक चुनाव, महिला आरक्षण और यूसीसी बिल पेश होना खास है. पर इन सबके बीच चर्चा का सबसे प्रमुख विषय अन्य पिछड़ा वर्ग के सबकैटेगराइजेशन के संबंध में न्यायमूर्ति रोहिणी आयोग की एक रिपोर्ट हो गई है. कहा जा रहा है कि सरकार इसे संसद के विशेष अधिवेशन में पेश कर सकती है. यह रिपोर्ट जुलाई में ही कमीशन ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंपी थीं.
दरअसल ऐसा माना जा रहा है कि जातिगत जनगणना का दबाव सरकार पर बढ़ता जा रहा है. विपक्ष के इस मुद्दे की काट सरकार को नहीं मिल रही है इसलिए जल्द से जल्द रोहिणी कमीशन की रिपोर्ट पर संसद में बहस कराई जा सकती है. जाहिर है कि इस मुद्दे पर विपक्ष की बोलती बंद हो सकती है. पर इसका एक और पक्ष भी है. विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने मंडल कमीशन की रिपोर्ट को लागू जरूर किया पर उन्हें ओबीसी कम्युनिटी का वोट हासिल करने में सफल साबित नहीं हुए थे. दूसरे बीजेपी को अपने कोर वोटर के नाराज होने का भी खतरा है. पार्टी के अंदर भी इसे पेश किए जाने और लागू किए जाने को लेकर मतभेद है.आइये रोहिणी कमीशन का गठन क्यों हुआ , क्या इसकी फाइंडिंग्स हैं, और इसका क्या राजनीतिक इंपैक्ट होने वाला है इस पर चर्चा करते हैं.
कब और क्यों हुआ रोहिणी आयोग का गठन
राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के अनुसार अन्य पिछड़ा वर्ग की आबादी देश की आबादी की करीब 41 प्रतिशत है. पर मंडल आयोग के हिसाब से करीब 52 प्रतिशत है. मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू होने के बाद से ओबीसी वर्ग को केंद्र सरकार की नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश में 27 प्रतिशत आरक्षण मिलता है.पर शिकायत रही है कि यह लाभ कुछ मुट्ठी भर लोग हथिया ले रहे हैं.जिनको वास्तव में जरूरत है उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिल रहा है. आयोग का प्राथमिक उद्देश्य ओबीसी के बीच आरक्षण लाभ के उचित वितरण के लिए विधि,आधार और मानदंड तैयार करना था.सरकार ने इसी सोच को आधार में रखकर अक्टूबर 2017 में रोहिणी कमीशन बनाया था. आयोग को यह काम सौंपा गया कि केंद्र की ओबीसी लिस्ट में शामिल करीब ढाई हजार OBC जातियों की सब-कैटेगरी तय करने के बाद 27 फीसदी कोटा को उनके अनुपात में किस तरह दिया जाए कि किसी के साथ अन्याय न हो सके. दक्षिण भारत के राज्यों ने इसमें बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया. इरादा यह था कि ओबीसी लिस्ट में शामिल प्रभावशाली जातियों के कोटा की एक लिमिट तय की जाए ताकि OBC की कमजोर जातियां भी आरक्षण का लाभ उठा सकें.
क्या है रिपोर्ट में
इंडिया टुडे की एक खबर के अनुसार रोहिणी आयोग ने ओबीसी कोटा के तहत केंद्र सरकार की नौकरियों और प्रवेश के आंकड़ों का विश्लेषण किया .आयोग को पता चला कि सभी नौकरियों और शिक्षा के लिए कॉलेजों की सीटों में से 97 परसेंट हिस्सा ओबीसी उपजातियों की 25 प्रतिशत के पास हैं. करीब 983 ओबीसी समुदायों को सरकारी नौकरियों और कॉलेजों में सीट के रूप में हिस्सेदारी बिल्कुल भी नहीं मिली.

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