
विदेश की करोड़ों कमाई या भारत की 45 लाख की नौकरी? गूगल इंजीनियर ने खोली सैलरी की सच्चाई
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गूगल के सॉफ्टवेयर इंजीनियर वैभव अग्रवाल की लिंक्डइन पोस्ट वायरल हो रही है, जिसमें उन्होंने बताया कि बेंगलुरु में 45 लाख रुपये सालाना की सैलरी कई मामलों में लंदन की 108,000 पाउंड की सैलरी से बेहतर हो सकती है.
सोशल मीडिया पर अक्सर विदेशी नौकरियों और करोड़ों के पैकेज को सफलता का पैमाना मान लिया जाता है. लेकिन क्या वाकई सिर्फ बड़ी सैलरी ही बेहतर जिंदगी की गारंटी होती है? इसी सवाल को लेकर गूगल के एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर की लिंक्डइन पोस्ट इन दिनों चर्चा में है. उन्होंने बेंगलुरु में 45 लाख रुपये सालाना की सैलरी और लंदन में मिलने वाली बड़ी पाउंड की सैलरी की तुलना की और समझाया कि सिर्फ रकम देखकर यह तय नहीं किया जा सकता कि कौन-सी कमाई बेहतर है. असली फर्क तब समझ में आता है, जब जीवन के खर्च और पैसों की असली कीमत यानी क्रय शक्ति (PPP) को ध्यान में रखा जाए.
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लिंक्डइन पर वायरल गूगल के एक टेक्निकल एक्सपर्ट समझाया है कि क्यों बेंगलुरु में 45 लाख रुपये सालाना की सैलरी कई मामलों में लंदन की ऊंची सैलरी से बेहतर हो सकती है. इस विषय पर उनकी एक पोस्ट सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लिंक्डइन पर वायरल हो रही है. बेंगलुरु में काम कर रहे गूगल के सॉफ्टवेयर इंजीनियर वैभव अग्रवाल ने अपनी पोस्ट में बताया कि सिर्फ बड़ी रकम देखकर यह तय नहीं किया जा सकता कि कौन-सी नौकरी बेहतर है. उन्होंने कहा कि किसी भी देश में सैलरी की असली कीमत समझने के लिए जीवन यापन की लागत और क्रय शक्ति समता (PPP) को समझना बहुत जरूरी है.
लंदन और भारत की तुलना की वैभव के मुताबिक, कागजों पर देखें तो लंदन में मिलने वाली 108,000 पाउंड सालाना सैलरी भारतीय रुपये में करीब 1.15 करोड़ रुपये बनती है. लेकिन असल जिंदगी में खर्च निकालने के बाद तस्वीर बिल्कुल अलग होती है.उन्होंने बताया कि बेंगलुरु में 45 लाख रुपये सालाना कमाने वाला व्यक्ति हर महीने करीब 2.7 लाख रुपये घर ला सकता है. इस पैसे में वह किसी सुरक्षित और अच्छी सोसाइटी में दो बेडरूम का बड़ा फ्लैट, घरेलू नौकर, ऐप से मंगाया गया सामान और टैक्सी जैसी सुविधाएं आसानी से ले सकता है. ऐसे लोग भारत के टॉप 1% कमाने वालों में आते हैं और आरामदायक जीवन जीते हैं.
जिंदगी आरामदायक तो है, लेकिन आलीशान नहीं वहीं दूसरी तरफ, लंदन में 108,000 पाउंड की सैलरी से टैक्स और बीमा कटने के बाद हाथ में करीब 6,100 पाउंड महीना ही बचता है. इस रकम में ज़ोन-2 इलाके में एक साधारण एक बेडरूम फ्लैट का किराया करीब 2,200 पाउंड होता है. ऐसे में लोगों को ज़्यादातर पब्लिक ट्रांसपोर्ट का सहारा लेना पड़ता है और खाना बनाना और घर की सफाई खुद करनी होती है. वैभव के अनुसार, यह जिंदगी आरामदायक तो है, लेकिन बहुत आलीशान नहीं कही जा सकती.
इस पोस्ट पर कई लोगों ने अपनी राय भी रखी। कुछ लोगों ने कहा कि लोग सिर्फ पैसों के लिए विदेश नहीं जाते, बल्कि अंतरराष्ट्रीय अनुभव, बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं, साफ माहौल और बेहतर जीवन गुणवत्ता के लिए जाते हैं। वहीं कुछ यूज़र्स ने कहा कि पीपीपी की बात उठाना जरूरी है, क्योंकि विदेश की बड़ी सैलरी को बिना खर्च समझे दिखाना लोगों को गुमराह करता है. कुल मिलाकर, यह पोस्ट यह समझाती है कि अधिक कमाई का मतलब सिर्फ बड़ी सैलरी नहीं होता, बल्कि यह इस बात पर निर्भर करता है कि उस पैसे से आप कैसी ज़िंदगी जी पा रहे हैं।

बेंगलुरु के कंस्ट्रक्शन साइट्स और स्थानीय बाजारों में चिपकी बड़ी-बड़ी, पूरी तरह खुली आंखों वाली एक रहस्यमयी महिला की तस्वीरें इन दिनों सोशल मीडिया पर जबरदस्त चर्चा का विषय बनी हुई हैं. इन पोस्टर्स ने लोगों की दिलचस्पी बढ़ा दी है और इंटरनेट पर यह सवाल उठने लगा है कि आखिर यह महिला कौन है और उसकी तस्वीर हर जगह क्यों दिखाई दे रही है.

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