
वरिष्ठ पत्रकार संकर्षण ठाकुर का निधन, गुरुग्राम के अस्पताल में ली आखिरी सांस
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पत्रकार संकर्षण ठाकुर सिर्फ अपनी पत्रकारिता या रिपोर्टिंग के लिए ही नहीं बल्कि अपने गंभीर लेखन के लिए भी याद किए जाएंगे. ‘द मेकिंग ऑफ़ लालू यादव: द अनमेकिंग ऑफ़ बिहार’, सबाल्टर्न साहेब (लालू प्रसाद यादव की जीवनी), सिंगल मैन, द ब्रदर्स बिहारी जैसी किताबें राजनीति को समझने का बेहतर जरिया बनी हैं.
द टेलीग्राफ के संपादक रहे वरिष्ठ पत्रकार, संकर्षण ठाकुर नहीं रहे. उनका गुरुग्राम के एक अस्पताल में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया. वे 63 वर्ष के थे. उनके निधन से पत्रकारिता जगत और उनके पाठक शोकाकुल हैं. संकर्षण ठाकुर न केवल अपने तीक्ष्ण विश्लेषण और संवेदनशील लेखन के लिए जाने जाते थे, बल्कि उनकी कलम ने भारत की राजनीति, खासकर बिहार और जम्मू-कश्मीर की जटिलताओं को इस तरह उकेरा कि उसका कोई सानी नहीं है.
पटना के सेंट जेवियर्स से पढ़ाई 1962 में पटना में जन्मे संकर्षण ठाकुर वरिष्ठ पत्रकार जनार्दन ठाकुर के बेटे थे. उनकी शुरुआती शिक्षा पटना के सेंट जेवियर्स स्कूल में हुई, जिसके बाद दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज से उन्होंने राजनीति विज्ञान में डिग्री हासिल की. 1984 में संडे पत्रिका से अपने पत्रकारीय करियर की शुरुआत करने वाले ठाकुर ने द इंडियन एक्सप्रेस, तहलका और द टेलीग्राफ जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी छाप छोड़ी. उनके परिवार में उनकी पत्नी सोना, बेटी जहान और बेटा आयुष्मान हैं. ठाकुर की लेखनी में बिहार की मिट्टी की सोंधी खुशबू थी, और उनकी किताबें इसकी गवाह हैं.
किताबें, जो बन गईं राजनीति की पाठशाला ‘द मेकिंग ऑफ़ लालू यादव: द अनमेकिंग ऑफ़ बिहार’, सबाल्टर्न साहेब (लालू प्रसाद यादव की जीवनी), सिंगल मैन, द ब्रदर्स बिहारी जैसी उनकी किताबों ने न केवल बिहार की सियासत को समझने का नया नजरिया दिया, बल्कि उनकी लेखन शैली ने पाठकों को गहरे तक प्रभावित किया. संकर्षण ठाकुर की खासियत थी उनकी निष्पक्षता और गहरी अंतर्दृष्टि. चाहे वह कारगिल युद्ध की रिपोर्टिंग हो, भोपाल गैस त्रासदी हो, 1984 के सिख विरोधी दंगे हों या इंदिरा गांधी की हत्या, ठाकुर ने अपनी लेखनी से हर घटना को न सिर्फ तथ्यों के साथ पेश किया बल्कि बल्कि उनकी लिखावट में मानवीय संवेदनाएं भी झलकती थीं.
जम्मू-कश्मीर के बारे में उनकी रिपोर्टिंग को लेकर जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा, “संकर्षण उन गिने-चुने पत्रकारों में थे, जिन्होंने जम्मू-कश्मीर की गहराई से यात्रा की और बिना किसी पूर्वाग्रह के वहां की आवाज को सुना.”
पुरस्कार और सम्मान संकर्षण ठाकुर को उनकी उत्कृष्ट पत्रकारिता के लिए 2001 में प्रेम भाटिया पुरस्कार और 2003 में अप्पन मेनन फेलोशिप से सम्मानित किया गया. एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने उनके निधन पर शोक जताते हुए कहा, “संकर्षण ऐसे लेखक थे, जिन्होंने भारत की कई ऐतिहासिक घटनाओं को अपनी लेखनी से जीवंत किया.” सोशल मीडिया पर ठाकुर के निधन के बाद श्रद्धांजलियों का दौर जारी है. वरिष्ठ पत्रकार एजे फिलिप ने अपने लेख “संकर्षण ठाकुर: ए रीपोर्टर हू रोट विद ए पोएट्स पेन” में उनकी कारगिल युद्ध की रिपोर्टिंग को याद किया. उन्होंने लिखा, “जब ठाकुर गोवा में छुट्टियां मना रहे थे, तब कारगिल युद्ध की खबर सुनते ही वे तुरंत वहां पहुंचे. उनकी रिपोर्ट्स में वह गहराई थी, जो केवल प्रिंट मीडिया ही दे सकता है.”
इस साल जनवरी में, ठाकुर ने अपने दोस्त तरुण भारतीय के निधन पर एक पोस्ट में लिखा था, “जीवन की क्रूर अनिश्चितताएं.” शायद वे नहीं जानते थे कि उनके ये शब्द उनकी अपनी यात्रा का भी आलम बयां करेंगे. संकर्षण ठाकुर की लेखनी और उनका साहस पत्रकारिता के इतिहास में हमेशा जीवित रहेंगे.

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