
रूस पर पाबंदियों का दबाव बनाने वाला अमेरिका खुद कितनी बार निशाने पर आ चुका, किन देशों ने लगाए प्रतिबंध?
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अमेरिका लगातार यूरोप पर प्रेशर बना रहा है कि वो रूस पर और पाबंदियां लगाए. ये उसका पुराना तरीका है. जब भी किसी देश के साथ तनाव बढ़ा, उसने तुरंत उस पर तमाम आर्थिक-डिप्लोमेटिक प्रतिबंध मढ़ दिए. लेकिन खुद अमेरिका पूरी तरह पाक-साफ नहीं. उसपर भी कई गंभीर आरोप लगते रहे. तो क्या उस पर भी किसी ने प्रतिबंध लगाया?
रूस, ईरान और उत्तर कोरिया लंबे समय से अमेरिकी पाबंदियों के बीच जी रहे हैं. अब यूक्रेन युद्ध न रोकने पर यूएस एक बार फिर से रूस पर हमलावर हो गया. उसने खुद तो मॉस्को पर भर-भरकर पाबंदियां लगा दीं, साथ ही अपने साथी यूरोप से भी इसरार कर रहा है कि वो भी ऐसा ही करे. लेकिन यूएस खुद भी प्रतिबंधों से बचा नहीं. कई देश हैं, जिन्होंने उससे हर तरह की बोलचाल और रिश्ता खत्म कर रखा है. लेकिन क्या इससे अमेरिकी ताकत पर जरा भी फर्क पड़ सका? अगर नहीं, तो फिर प्रतिबंधों का मतलब ही क्या है?
अमेरिका ने किनपर प्रतिबंध लगा रखा है ईरान, रूस, अफगानिस्तान, चीन, वेनेजुएला और उत्तर कोरिया का नाम लिस्ट में टॉप पर रहा. इन सारे देशों के साथ अमेरिका की उठापटक चलती रही. वैसे इनके अलावा भी 20 से ज्यादा देश हैं, जिनपर यूएस ने अलग-अलग तरह से बैन लगा रखा है.
इससे क्या फर्क पड़ता है फर्क तो काफी पड़ता है, जो इसपर निर्भर है कि प्रतिबंध किस तरह का है. जैसे, अगर किसी देश ने मानवाधिकार हनन किया, या परमाणु बम बनाने लगे, या कुछ भी ऐसा करे, जिससे वैश्विक शांति भंग हो सकती हो, तो देश उसपर बैन लगाने लगते हैं. सोशल टर्म्स में समझें तो यह बिरादरी-बाहर करने जैसा है. इसके तहत आर्थिक और कूटनीतिक बैन लगाया जाता है. मतलब उस देश के साथ व्यापार बंद या सीमित हो जाता है, साथ ही उसके नेताओं को उस देश में यात्रा की इजाजत नहीं रहती है. बहुत बार सैन्य प्रतिबंध भी लगाए जाते हैं, मसलन, हथियार बेचने-खरीदने पर रोक या डिफेंस सहयोग रोक देना.
इसी तरह एसेट फ्रीजिंग भी काम करता है. मिसाल के तौर पर ब्रिटेन ने रूस के बैंकों को अपने वित्तीय ढांचे से अलग कर दिया. इसका मतलब ये कि रूसी बैंक ब्रिटिश बैंकों के साथ लेनदेन नहीं कर सकते. इसका असर आम लोगों पर होता है. रूसी नागरिक तय सीमा से अधिक रकम ब्रिटिश बैंकों से नहीं निकाल सकते. वे नाराज होंगे, जिससे रूस की सरकार पर दबाव बढ़ेगा कि वो यूके या यूएस की बात मान ले.
अगर देश मजबूत है और उसके पास खुद का संसाधन है तो वह टिक जाता है. वो दूसरे देशों के साथ व्यापार करने लगता है. और उन्हीं के साथ सैन्य समझौते करने लगता है. इससे बहुत सारे प्रतिबंधों के बीच भी वो मैदान में लंबा टिक सकता है. जैसे यूक्रेन से युद्ध करने पर रूस पर भी ढेरों बैन लगे लेकिन वो सर्वाइव कर रहा है. वहीं इकनॉमी अगर कमजोर हो तो नुकसान पहुंचाना आसान है. वो अकेला पड़ जाता है. सरकार तब भी अड़ी रहे तो जनता भी सरकार के खिलाफ हो जाती है और उसे झुकना होता है.
अब बात आती है यूएस की, तो हरेक को प्रतिबंधों को डर दिखाने वाला ये देश खुद भी उससे बचा नहीं.

लेकिन अब ये कहानी उल्टी घूमने लगी है और हो ये रहा है कि अमेरिका और चीन जैसे देशों ने अमेरिका से जो US BONDS खरीदे थे, उन्हें इन देशों ने बेचना शुरू कर दिया है और इन्हें बेचकर भारत और चाइना को जो पैसा मिल रहा है, उससे वो सोना खरीद रहे हैं और क्योंकि दुनिया के अलग अलग केंद्रीय बैंकों द्वारा बड़ी मात्रा में सोना खरीदा जा रहा है इसलिए सोने की कीमतों में जबरदस्त वृद्धि हो रही हैं.

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