
रूस और उसके साथियों का सैन्य गुट क्यों दबा-छिपा है, NATO से कितना कमजोर या ताकतवर?
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इजरायली हमले के बाद कतर की राजधानी दोहा में अरब लीग और इस्लामिक देशों का जमावड़ा हुआ. चर्चा है कि ये मुल्क मिलकर नाटो की तरह एक और सैन्य संगठन बना सकते हैं. अगर ऐसा हुआ तो अमेरिका-फंडेड नाटो शायद अपना रुतबा खो बैठे. वैसे अमेरिका और यूरोप के पास तो दुनिया का सबसे ताकतवर सैन्य गुट है, लेकिन दूसरी महाशक्ति यानी रूस के हिस्से क्या है?
दूसरे वर्ल्ड वॉर के बाद अमेरिका और सोवियत संघ (अब रूस) के बीच तनाव गहरा चुका था. हर देश डरा रहता है कि जाने कब तीसरी लड़ाई छिड़ जाए. ऐसा होने पर सुरक्षित रह सकें, इसके लिए कई देशों ने मिलकर नाटो का गठन किया. अमेरिका इसमें सबसे ज्यादा बजट और सैनिक लगाने लगा. दूसरी तरफ रूस ने भी अपने कुछ संगी-साथियों के साथ मिलकर एक गुट बना लिया. पूरी सदी बीत गई लेकिन नाटो का जलवा बना रहा.
अब बहुत से देश सैन्य संगठन बना रहे हैं, लेकिन क्या रूस के पास कोई सैन्य गुट है?
अगर है तो उस पर चर्चा इतनी कम क्यों होती है, जबकि वो अमेरिका को सीधी टक्कर देता रहा?
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बने नाटो की एक ही लाइन थी- अगर किसी सदस्य पर हमला होगा तो उसे सब पर अटैक माना जाए और मुकाबला किया जाए. आज नाटो में अमेरिका और कनाडा के अलावा लगभग पूरा यूरोप शामिल हैं. सभी इकनॉमिक तौर पर मजबूत. कई एशियाई देश भी पार्टनर हैं, और साथ मिलकर सैन्य अभ्यास करते हैं, हालांकि पूरी सुरक्षा की गारंटी उनके पास नहीं.
नाटो के पास केवल सैनिक ही नहीं, बल्कि मॉडर्न तकनीक भी है. साथ ही सभी मिलकर इंटेलिजेंस नेटवर्क बनाते हैं, जिसे दुनिया की छोटी से छोटी हलचल की भी खबर रहे. इन सब खूबियों के साथ नाटो बेहद शक्तिशाली बनता चला गया.
रूस के विरोध में नाटो बना तो जाहिर है कि रूस के पास भी इसका तोड़ होगा. तब उसके नेतृत्व में एक सैन्य गठबंधन था, जिसका नाम था- वारसॉ पैक्ट. इसमें पूर्वी यूरोप के साम्यवादी सोच वाले देश शामिल थे जैसे पोलैंड, हंगरी, चेकोस्लोवाकिया, बुल्गारिया, रोमानिया. अगर नाटो वेस्ट को मजबूत कर रहा था तो वारसॉ पैक्ट पूर्व की ताकत को बढ़ाने का जरिया था.

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