
यूपी में ब्राह्मणों को रिझाने की रेस, फिर शुरू हुआ सोशल इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट
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2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यूपी में ब्राह्मण वोट बैंक को साधने की कोशिशें तेज हो गई हैं. कोई खुलकर ब्राह्मण वोटर को संबोधित कर रहा है, तो कोई दबी जुबान से. या फिर खामोशी भी अख्तियार की जा रही है - लेकिन ओमप्रकाश राजभर ने आजमगढ़ में रैली कर इरादा तो जाहिर कर ही दिया है.
बीस साल बाद, बहुत कुछ बदल जाता है. लेकिन, निरंतरता हमेशा ही बेहतर नतीजे देती है. बशर्ते, हकीकत भी सतत प्रयासों को बराबर सपोर्ट कर रही हो - 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर सोशल इंजीनियरिंग के तमाम प्रयोग हो रहे हैं.
बीएसपी नेता मायावती के सोशल इंजीनियरिंग के सफल प्रयोग के 19 साल बाद फिर से वैसी ही कोशिशें हो रही हैं. सोशल इंजीनियरिंग 2.0 प्रोजेक्ट में कॉमन फैक्टर 'ब्राह्मण वोटर' है, लेकिन नए दौर में 'दलित वोटर' को 'ओबीसी वोटर' से रिप्लेस करने की कवायद चल पड़ी है.
अबकी बार मायावती ही नहीं, सोशल इंजीनियरिंग पर अखिलेश यादव ने भी दांव खेला है. लेकिन, इस प्रोजेक्ट में ताजा ताजा एंट्री हुई है सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी की. जिसके नेता ओम प्रकाश राजभर ने आजमगढ़ में बड़ी रैली की है, जिसमें 10 हजार ब्राह्मणों को बुलाया गया था - और ब्राह्मण समाज के सम्मान में खूब कसीदे पढ़े गए. नारे भी वैसे ही लगे - जय सुहेलदेव, जय परशुराम! ध्यान देने वाली बात ये है कि इस पर भी राजभर के निशाने पर समाजवादी पार्टी ही है.
'घूसखोर पंडत' से लेकर UGC के नए नियमों तक, और यूपी में ब्राह्मण बनाम ठाकुर की राजनीति को ध्यान से देखें तो हर मामले में ओमप्रकाश राजभर के सामाजिक समरसता महारैली की झलक दिखाई देती है - मतलब, आने वाले चुनाव के लिए हर लेवल पर सोशल इंजीनियरिंग 2.0 प्रोजेक्ट शुरू हो चुका है.
ओमप्रकाश राजभर और ब्राह्मण वोट बैंक
ब्राह्मण वोट बैंक को लेकर सोशल इंजीनियरिंग का यह प्रयोग काफी जोखिमभरा भी है. मायावती और बीएसपी का गिरता जनाधार मिसाल है. मायावती ने 2007 के बाद वैसे कई प्रयोग किए. दलित-मुस्लिम गठजोड़ की कवायद फेल हुई, तो फिर से दलित-ब्राह्मण कॉम्बो आजमाने की कोशिश हुई. गुजरते वक्त के साथ बीएसपी के कई साथी मायावती से दूर जा चुके थे, लेकिन प्रयोग के नोडल अफसर बीएसपी महासचिव सतीशचंद्र मिश्रा ही थे - और 2022 में मायावती यूपी में एक विधानसभा सीट पर सिमट कर रह गईं.

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