
मिजोरम पर बढ़ा घुसपैठ का खतरा, म्यांमार-बांग्लादेश से क्यों आ रहे हैं हजारों शरणार्थी?
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म्यांमार में चार साल पहले शुरू हुए सिविल वॉर का असर हमारे देश तक आ चुका. जुलाई के पहले ही सप्ताह में वहां के चिन स्टेट से हजारों लोग भागकर मिजोरम के चंफाई जिला पहुंच गए. राज्य में पहले से ही कई देशों के अवैध शरणार्थियों के होने की आशंका जताई जाती रही है, जो जंगलों और नदियों से होते हुए वहां पहुंचते रहे.
साल 2021 में म्यांमार में सैन्य तख्तापलट हुआ, जिसके बाद से वहां अस्थिरता है. इस बीच वहां से चिन शरणार्थी लगातार मिजोरम आ रहे हैं. मिजो समुदाय से कल्चरल समानता के कारण स्थानीय लोगों को खास समस्या भी नहीं रही. लेकिन इस छोटे स्टेट में पहले से ही कथित तौर पर बहुत से विदेशी शरणार्थी बसे हुए हैं. ऐसे में सवाल आता है कि नॉर्थ-ईस्ट के कई राज्यों की तर्ज पर क्या यहां भी घुसपैठ पर एक्शन हो सकता है?
मिजोरम की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि ये राज्य बांग्लादेश और म्यांमार की सीमाओं से जुड़ा है. म्यांमार में साल 2021 में सैन्य तख्तापलट के बाद से वहां गृहयुद्ध जैसे हालात हैं. सेना और अलग-अलग जातीय मिलिशिया में जबरदस्त टकराव हो रहा है. खासकर चिन स्टेट में चिन नेशनल डिफेंस फोर्स और चिनलैंड डिफेंस फोर्स- एच के बीच जुलाई की शुरुआत से संघर्ष चल रहा है. इसमें सबसे ज्यादा प्रभावित हो रही है वहां की चिन जाति, जो मिजोरम में मिजो समुदाय की करीबी मानी जाती है. यह आबादी देश के भीतर पलायन तो कर ही रही है, साथ ही हजारों लोग मिजोरम के चंफाई की तरफ भी आ रहे हैं.
डीडब्ल्यू की एक रिपोर्ट में बताया गया कि इस महीने जारी हिंसा के बीच हजारों की संख्या में लोग तियाउ नदी पार करके सीमाई कस्बों तक पहुंच चुके. बता दें कि मिजोरम और म्यांमार करीब 510 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करते हैं. यह बॉर्डर मिजोरम के ईस्टर्न हिस्से में फैला हुआ है और म्यांमार के चिन राज्य से लगता है.
इसका बड़ा भाग पहाड़ों और जंगलों से ढंका हुआ है, जिससे आवाजाही आसान हो जाती है. इसी सीमा के पास तियाउ नदी भी बहती है. कई गांव इसी के आरपार बसे हुए हैं. ये भी कुदरती ब्रिज का काम करती है. इसे ही पार करके लोग लगातार आ रहे हैं.
कब हुई शरणार्थी संकट की शुरुआत म्यांमार और मिजोरम की सीमाओं पर पहाड़ी आदिवासी रहते हैं, जिनका आपस में करीबी रिश्ता रहा. उन्हें मिलने-जुलने या व्यापार के लिए वीजा की मुश्किलों से न गुजरना पड़े, इसके लिए भारत-म्यांमार ने मिलकर तय किया कि सीमाएं कुछ किलोमीटर तक वीजा-फ्री कर दी जाएं. साल 1968 में बीच फ्री मूवमेंट संधि हुई. इसके तहत दोनों ही तरफ के लोग 40 किलोमीटर तक बिना वीजा और बिना खास रोकटोक के सीमा पार कर सकते थे. लगभग दो दशक पहले इसे घटाकर 16 किलोमीटर किया गया और फिर कुछ ही साल पहले और कई बदलाव हुए.
भारत-म्यांमार मुक्त आवाजाही के लिए जो पास जारी होता, वो सालभर के लिए वैध होता, और एक बार सीमा पार करने वाले दो हफ्ते तक दूसरे देश में रह सकते थे. इसके अलावा इस सीमा के भीतर स्थानीय व्यापार भी होता और पढ़ने-लिखने के लिए भी म्यांमार से लोग यहां तक आने लगे.

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