
महिला आरक्षण बिल: सरोजिनी नायडू की 92 साल पुरानी चिट्ठी, 27 साल पुराना बिल और मोदी सरकार की नई रणनीति
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राजनीति में महिलाओं की स्थिति की बात करें तो यह बहुत बेहतरीन तो कभी नहीं रही है. पहली लोकसभा 1952 में बनी और उसमें केवल 24 महिला सांसद थीं. यह संख्या घटती बढ़ती रही पर कभी भी 14 प्रतिशत से अधिक नहीं हुई. अभी मौजूदा लोकसभा में यानी 17वीं लोकसभा में महिला राजनेताओं की अब तक की सबसे अधिक संख्या 78 यानी लगभग 14% है
साल था 1931. भारत में आजादी का आंदोलन अपने चरम पर था. स्वाधीनता के लिए लड़ी जाने वाली इस लड़ाई में पुरुष ही नहीं, महिलाएं भी जोर-शोर से हिस्सा ले रही थीं. इसके साथ ही यह भावना भी बलवती हो रही थी कि राजनीतिक क्षेत्र में भी महिलाएं पुरुषों से किसी भी मायने में कम या पीछे नहीं हैं. इस भावना को बल देने वाली और जन भावना बनाने वाली जननायिका का नाम था सरोजिनी नायडू.
इसी साल सरोजिनी नायडू ने ब्रिटिश पीएम को पत्र लिखकर महिलाओं के राजनीतिक अधिकार को लेकर बात की थी. उनके मुताबिक महिलाओं को मनोनीत करके किसी पद पर बैठाना एक किस्म का अपमान है. वह चाहती थीं कि महिलाएं मनोनीत न हों, बल्कि चुनी जाएं. सरोजिनी नायडू के आजादी से 17 साल पहले ही उठाए इस कदम ने बाद में महिलाओं के आरक्षण संबंधी बहस को जन्म दिया.
महिला आरक्षण बिल पर चर्चा के लिए ये मौजूं समय इसलिए भी है, क्योंकि एक तो इसी महीने संसद का विशेष सत्र बुलाया गया है, जिसमें कई अन्य बिलों को पटल पर रखे जाने के साथ महिला आरक्षण बिल को भी पेश किए जाने की संभावना है तो वहीं एक और खास वजह है, जिसके कारण इस बिल पर बात करना प्रासंगिक हो जाता है. दरअसल इसी सितंबर महीने की 12 तारीख बेहद अहम है, क्योंकि तब इस बात को पूरे 27 साल हो जाएंगे, जब संसद के पटल पर पहली बार 1996 में महिला आरक्षण बिल रखा गया था. उस दौर में सरकार एचडी देवगौड़ा की थी, वह पीएम थे और महिला आरक्षण बिल को विरोधों का सामना करना पड़ा था, लिहाजा ये सिर्फ पेश हुआ, पास नहीं हो सका.
तब से लेकर अब स्थिति कितनी बदल गई है? राजनीति में महिलाओं की स्थिति की बात करें तो यह बहुत बेहतरीन तो कभी नहीं रही है. पहली लोकसभा 1952 में बनी और उसमें केवल 24 महिला सांसद थीं. यह संख्या घटती बढ़ती रही पर कभी भी 14 प्रतिशत से अधिक नहीं हुई. अभी मौजूदा लोकसभा में यानी 17वीं लोकसभा में महिला राजनेताओं की अब तक की सबसे अधिक संख्या 78 यानी लगभग 14% है, जबकि पिछली लोकसभा की बात करें तो तब 62 महिलाएं सांसद थीं.
इस बीच विडंबना यह भी है कि 1996 के बाद कई बार महिला आरक्षण विधेयक पटल पर रखा गया और हर बार इसे विरोध का ही सामना करना पड़ा. 2019 के लोकसभा चुनाव से भी दो साल पहले यानी 2017 में कांग्रेस अध्यक्ष रहीं सोनिया गांधी ने पीएम मोदी के नाम इसे लेकर चिट्ठी लिखी थी. महिला आरक्षण बिल 2010 में राज्यसभा से पास होने के बाद भी लोकसभा में पेश नहीं हो सका है. इसी वजह से अभी तक ये बिल अधर में लटका हुआ है.
कब-कब सदन में रोका गया बिल एक काम करते हैं, बिल पर और बातें करने से पहले ये जान लेते हैं 1996 में पटल पर रखे जाने से लेकर साल 2010 में राज्यसभा से पास होने तक महिला आरक्षण विधेयक कब-कब सदन से ठुकराया गया. इसका सिलसिला 12 सितंबर 1996 से शुरू होता है. बिल को पटल पर रखा गया, विरोध के कारण पास नहीं हो सका, फिर बिल को वाजपेयी सरकार में पटल पर लाया गया था, लेकिन उस साल भी बात नहीं बनी. इसी तरह 1999, 2003, 2004 और 2009 में बिल के पक्ष में उठने वाले आवाजें कम ही रह गईं, लिहाजा ये विधेयक पास नहीं हो सका. देखिए तारीखें...

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