
महाराष्ट्र में लटका कैबिनेट विस्तार, मंत्रियों का काम करेंगे सचिव, विपक्ष ने घेरा तो CMO ने दी सफाई
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मुख्य सचिव ने 4 अगस्त को इसको लेकर आदेश जारी किया, जिसमें विभाग के सचिवों को लंबित मामलों पर अंतरिम आदेश देने और महत्वपूर्ण मामलों में तत्काल सुनवाई करने का आदेश दिया गया है. इसके बाद जब विपक्ष ने इसको लेकर सरकार को घेरा तो सीएमओ की ओर से सफाई आई है कि अर्ध-न्यायिक मामलों को छोड़कर सचिव को कोई मंत्री स्तर की शक्तियां नहीं दी गई हैं.
महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे की सरकार बने हुए एक महीने से ज्यादा का समय हो गया है, लेकिन अब तक कैबिनेट का विस्तार नहीं हो पाया है. इस बीच महाराष्ट्र के मुख्य सचिव मनुकुमार श्रीवास्तव ने सीएम शिंदे के निर्देश के साथ कैबिनेट और राज्य मंत्रियों का अधिकार विभाग के सचिवों को सौंपने का आदेश जारी किया है. इस खबर के साथ ही कैबिनेट विस्तार की खबरों पर एक बार फिर विराम लग गया है.
मुख्य सचिव ने 4 अगस्त को इसको लेकर आदेश जारी किया, जिसमें विभाग के सचिवों को लंबित मामलों पर अंतरिम आदेश देने और महत्वपूर्ण मामलों में तत्काल सुनवाई करने का आदेश दिया गया है. मुख्यमंत्री के अगले आदेश तक विभाग के अतिरिक्त सचिव, प्रमुख सचिव और सचिवों को ये जिम्मेदारी सौंपी गई हैं. इस बीच विपक्ष के नेता अजीत पवार ने नौकरशाहों को मंत्री पद सौंपने के लिए शिंदे-फडणवीस सरकार की आलोचना की. पवार ने कहा कि राज्य मंत्रिमंडल विस्तार में देरी के कारण लोगों में से चुने गए प्रतिनिधि अपने अधिकारों से वंचित हैं. उन्होंने कहा कि इस तरह के आदेश से राज्य में बुरी मिसाल कायम होगी.
कांग्रेस ने भी सरकार को घेरा
महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी (MPCC) के मुख्य प्रवक्ता अतुल लोंधे ने इसको लेकर कहा कि दिवंगत मुख्यमंत्री शंकरराव चव्हाण ने सचिवालय का नाम बदलकर मंत्रालय किया था. क्योंकि लोगों को महसूस होना चाहिए कि शासन उनके द्वारा चुने गए लोगों द्वारा चलाया जा रहा है. सरकार का नेतृत्व जन प्रतिनिधियों द्वारा किया जाना चाहिए क्योंकि वे लोगों द्वारा चुने जाते हैं, निर्णय उनके होने चाहिए न कि सचिवों के.
सीएमओ की ओर से आई सफाई
हालांकि मुख्यमंत्री कार्यालय द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में यह स्पष्ट किया गया है कि अर्ध-न्यायिक मामलों को छोड़कर सचिव को कोई मंत्री स्तर की शक्तियां नहीं दी गई हैं. ये सभी शक्तियां पहले की तरह मंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद में निहित हैं. इसलिए यह कहना पूरी तरह गलत है कि निर्णय लेने की सारी प्रक्रिया सचिव के हाथों में दे दी गई है.

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