
भ्रष्टाचार में डूबा मुल्क, नेपोटिज्म में उलझी सियासत और पीढ़ियों का गुस्सा... नेपाल में बगावत की असली वजह क्या?
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नेपाल की सियासत में गहरे तक पैठ कर चुके भ्रष्टाचार ने देश में उद्योग-धंधों को चौपट करना शुरू कर दिया. निवेशकों ने दूरी बनानी शुरू कर दी. इसका सीधा असर रोजगार पर भी पड़ा. बड़ी संख्या में युवाओं ने काम की तलाश में भारत से लेकर मलेशिया और गल्फ का रुख करना शुरू किया. इससे युवाओं में धीरे-धीरे सियासत के प्रति नफरत पनपने लगी.
नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री और मशहूर लेखक बीपी कोइराला ने अपनी किताब Narendra Dai में लिखा है कि हमने सालों तक सहा, चुपचाप बैठे रहे, लेकिन अब गुस्से की ज्वाला बाहर आनी चाहिए. इस समाज की जड़ता ने हमें दबाया, अब विद्रोह का समय है. उन्होंने बेशक इन पंक्तियों को राणा शासन के दमन के विरोध में लिखा था. लेकिन नेपाल की मौजूदा स्थिति को देखकर लग रहा है कि मानो जैसे उन्होंने दशकों पहले ही नेपाल की इस बगावत की भविष्यवाणी कर दी थी.
कोइराला ने अपनी कलम से विद्रोह की जिस अलख को जगाने की कोशिश की. वह काठमांडू की सड़कों पर सुलगती दिखी. नेपाल की सड़कों पर आज विद्रोह का जो बिगुल बजा है. वह सिर्फ युवाओं की अचानक की गई बगावत नहीं है बल्कि सालों से धधक रहा ज्वालामुखी है, जो अब फट पड़ा है. इस हिंसा को बेशक जायज ठहराया नहीं जा सकता. लेकिन वर्षों के भ्रष्टाचार से लेकर नेपोटिज्म और ज्यादती का हिसाब चुकता करने के लिए युवा सड़कों पर हैं और हिंसा का रास्ता अख्तियार कर रहे हैं. तभी तो विद्रोही भीड़ मौजूदा हुक्मरानों से लेकर पूर्व प्रधानमंत्रियों और उनके परिवार वालों पर हमला करने से भी नहीं चूक रही.
लेकिन नेपाल में युवाओं का जो गुस्सा फूटा है, उसकी जड़ें बरसों की नाइंसाफी और हुक्मरान के खिलाफ पनप रहे गुस्से से सींची गई हैं. चार्ल्स टिली ने अपनी किताब The Politics of Collective Violence में भीड़ की हिंसा पर विस्तार से लिखा है. वह लिखते हैं कि भीड़ की हिंसा को अक्सर irrational act यानी तर्क या समझदारी से परे समझा जाता है लेकिन असल में ये political performance है.
उन्होंने बताया है कि हिंसा सिर्फ भावनात्मक या व्यक्तिगत नहीं होती बल्कि यह राजनीतिक और सामाजिक शक्ति के संघर्ष से जुड़ी होती है. ये एक तरह का कलेक्टिव एक्शन है, जो समाज में बदलाव, सत्ता की मांग या संसाधनों के लिए किए जाने वाले कंपटीशन से पैदा होता है. सामाजिक आंदोलन दबाए जाते हैं तो हिंसा की संभावना बढ़ जाती है. दरअसल आर्थिक और सामाजिक असमानता हिंसा को भड़काती हैं.
टिली इस किताब में रिपरटॉयर ऑफ कंटेंशन (repertoires of contention) का कॉन्सेप्ट बताते हैं कि हिंसा का स्वरूप समय और स्थान के साथ बदलता है, लेकिन इसके मूल में सामाजिक और राजनीतिक ताकत का संघर्ष होता है.
लेकिन सवाल है कि नेपाल में इतने दशकों से आखिर हो क्या रहा था? जो लोगों का गुस्सा इस कदर भड़का हुआ है. नेपाल के प्रधानमंत्री और उनकी सरकार के खिलाफ इस गुस्से की वजह तो समझ आती है लेकिन पूर्व प्रधानमंत्रियों और उनके परिवार पर हमले हैरान करने वाले रहे. इसका जवाब नेपाल में बरसों से हुए घोटालों की गर्त में छिपा है.

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