
बीजेपी के खिलाफ ममता बनर्जी का भाषा आंदोलन कितना कारगर?
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ममता बनर्जी के भाषा आंदोलन का मकसद बांग्ला बोलने वालों को एकजुट करना, और विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी के खिलाफ नाकेबंदी की कोशिश है. ममता बनर्जी ने प्रवासी बंगालियों से भावनात्मक अपील की है और लौटने पर हर संभव मदद का आश्वासन भी दे रही हैं.
ममता बनर्जी आने वाले पश्चिम बंगाल चुनाव में संभावित खतरों को लेकर काफी सशंकित हैं, लिहाजा काफी पहले से ही नाकेबंदी शुरू कर दी है. ममता बनर्जी को SIR में भी CAA और NRC जैसा ही राजनीतिक खतरा महसूस हो रहा है. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री की बातों से तो ऐसा ही लगता है, और यही वजह है कि केंद्र में सत्ताधारी बीजेपी नेतृत्व के खिलाफ आक्रामक हो गई हैं.
देश के कुछ हिस्सों में बांग्लाभाषी लोगों के खिलाफ पुलिस एक्शन ने ममता बनर्जी को मौका भी दे दिया है. असल में, ऐसी घटनाओं की रिपोर्ट उन राज्यों से ही आई है जहां बीजेपी की सरकार है. मौका हाथ लगते ही, ममता बनर्जी खुल कर बीजेपी के खिलाफ खेलने लगी हैं, ताकि आने वाले विधानसभा चुनाव में फिर से 'खेला' किया जा सके - लेकिन, बीजेपी भी अब पहले से ज्यादा सतर्क है.
केंद्र की सत्ता पर काबिज होने के बाद से कई राज्य बीजेपी नेतृत्व की आंखों में खटकता रहा है. दिल्ली के किले पर फतह के बाद बीजेपी का अगला लक्ष्य पश्चिम बंगाल ही है. कहां बीजेपी 2019 के आम चुनाव में मिली कामयाबी से आगे बढ़ना चाहती थी, और कहां 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में झटके पर झटके खाने पड़ गये - अब तो वो जख्मी शिकारी की तरह मौके की तलाश में बैठी है.
ममता बनर्जी को मालूम है कि अगर समय से बीजेपी के खिलाफ मुहिम शुरू नहीं की, मुश्किलें विकराल और बेकाबू हो सकती हैं - और यही सब देख और सोच-समझकर ममता बनर्जी ने भाषा आंदोलन शुरू किया है.
अब सवाल ये उठता है कि बीजेपी के खिलाफ ममता बनर्जी का भाषा आंदोलन कितना कारगर साबिते हो पाता है?
ममता का भाषा आंदोलन कितना प्रभावी होगा

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