
बांग्लादेश: तारिक़ रहमान का स्वागत पर मोहम्मद यूनुस से क्यों रही भारत की इतनी तल्ख़ी
BBC
तारिक़ रहमान का भारत खुली बाँहों से स्वागत कर रहा है लेकिन मोहम्मद यूनुस को लेकर ऐसा बिल्कुल नहीं था. क्या तारिक़ रहमान के आने से बांग्लादेश इतना बदल गया है कि भारत की नीति बदल गई?
मोहम्मद यूनुस बांग्लादेश के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित पोर्ट सिटी चटगाँव में पले-बढ़े. अपने पिता के नौ बच्चों में यूनुस तीसरे बच्चे थे.
वह बॉय स्काउट्स में सक्रिय थे और किशोरावस्था में जापान, अमेरिका और यूरोप सहित दूर-दराज़ स्थानों पर अंतरराष्ट्रीय जैम्बोरी में भाग लेने के लिए यात्रा की.
उन्हें वेंडरबिल्ट यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के लिए फुलब्राइट स्कॉलरशिप मिली थी, जहाँ उन्होंने 1971 में अर्थशास्त्र में पीएच.डी. की और मिडिल टेनेसी स्टेट यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र पढ़ाया भी.
1971 में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ बांग्लादेश के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान, यूनुस ने नए देश को आधिकारिक मान्यता दिलाने के लिए अमेरिकी सरकार से पैरवी की और बांग्लादेशी प्रवासी समुदाय के लिए एक न्यूज़लेटर चलाने में मदद की.
यूनुस 1972 में बांग्लादेश लौटे. स्वतंत्रता सेनानी और शेख़ हसीना के पिता शेख़ मुजीब-उर रहमान के नेतृत्व में नए देश के निर्माण में भाग लेने के लिए उत्सुक थे. उन्होंने पहले सरकार के योजना आयोग में भूमिका निभाई, उसके बाद अपने गृह नगर की यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र पढ़ाने लौट आए.
मोहम्मद यूनुस ने 2006 में नोबेल शांति पुरस्कार मिलने के एक साल बाद अगस्त 2007 में नागरिक शक्ति नाम से एक राजनीतिक पार्टी बनाई थी. लेकिन यह पार्टी चल नहीं पाई.
30 नवंबर 2007 को अमेरिकी अख़बार वाल स्ट्रीट जर्नल ने मोहम्मद यूनुस से पूछा था कि उनकी पार्टी आगे क्यों नहीं बढ़ पाई?













