
बच्चों को खिलाने वाले खुद भूखे! यूपी में महीनों से तनख्वाह की राह देख रहीं ये बेबस महिलाएं
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बच्चे पढ़ें, स्वस्थ रहें, गरीबों के बच्चों को सरकारी स्कूल में पौष्टिक खाना मिले, देश का भविष्य सुरक्षित रहे. इन सबकी जिम्मेदारी निभाने वाली महिलाएं लाचार हो जाती हैं. जब महीने, दो महीने नहीं बल्कि आठ आठ महीने तक इनकी मेहतन का मानदेय देने में सिस्टम लचर हो जाता है. जो रोज सात घंटे काम करने के बदले पचास रुपए पाने वाली महिला रसोइया का हक भी समय से नहीं देते. उत्तर प्रदेश में मिड डे मील बनाकर बच्चों को खिलाने वाली करीब चार लाख महिला रसोइया का आठ महीने से पैसा रोककर रखा रहा है. महिलाओं ने दस्तक दी, अब जाकर चार महीने का उनके अधिकार का पैसा जारी होने लगा है. देखें पूरी वीडियो.

आज जब वक्त इतना कीमती हो गया है कि लोग हरेक चीज की दस मिनट में डिलीवरी चाहते हैं. वहीं दूसरी तरफ विडंबना ये है कि भारत का एक शहर ऐसा है जहां इंसान को कहीं जाने के लिए सड़कों पर ट्रैफिक में फंसना पड़ता है. यहां हर साल औसतन 168 घंटे लोग ट्रैफिक में फंसे रहते हैं. यानी पूरे एक हफ्ते का समय सिर्फ ट्रैफिक में चला जाता है.

जिस शहर की फायरब्रिगेड के पास छोटे से तालाब के पानी से एक शख्स को निकालने के लिए टूल नहीं है, वह किसी बड़े हादसे से कैसे निबटेगा. युवराज मेहता की मौत ने नोएडा की आपदा राहत तैयारियां की कलई खोल दी है. सवाल यह है कि जब नोएडा जैसे यूपी के सबसे समृद्ध शहर में ये हालात हैं तो बाकी शहर-कस्बों की स्थिति कितनी खतरनाक होगी.

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