
पत्नी से जबरन अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने को जायज ठहराना, पुरुषों को बर्बरता का अधिकार देना है
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अगर पत्नी की उम्र 15 साल या उससे अधिक है, तो पति का अपनी पत्नी के साथ यौन संबंध बनाना बलात्कार नहीं माना जाएगा. ऐसे में अप्राकृतिक कृत्य के लिए पत्नी की सहमति नहीं मिलना भी महत्वहीन हो जाता है. आखिर कानून बनाने वालों के भीतर 'महिला की सहमति' को लेकर संवेदना कब जागेगी?
छत्तीसगढ़ की एक महिला से उसका पति इतनी बर्बरता से यौन संबंध बनाता है कि उसे हॉस्पिटल में एडमिट होना पड़ता है. पीड़िता ने अपनी मौत के पहले मजिस्ट्रेट को बताया था कि पति द्वारा बलपूर्वक बनाए गए यौन संबंध के कारण उसकी ये हालत हुई है. इस मामले में पीड़िता के मायके वालों ने उसके पति पर आईपीसी की धारा 376, 377 और 304 के तहत केस दर्ज करवाया. 2019 में जिला न्यायालय ने पीड़िता के पति को बलात्कार, अप्राकृतिक कृत्य और गैर-इरादतन हत्या के लिए दोषी ठहराया और 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई. पर हाईकोर्ट ने जिला अदालत के फैसले को खारिज करते हुए आरोपी पति को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया. जाहिर है कि ये फैसला रेप को लेकर बने कई कानूनों पर बहस का मौका देता है. खासतौर पर मैरिटल रेप को लेकर. कोर्ट के फैसले की आलोचना के बजाय हमें उन कानूनों में सुधार के बारे में विचार करना चाहिए जिसके चलते इस तरह के फैसले लेना न्यायाधीशों की मजबूरी हो जाती है.
मैरिटल रेप को क्यों कानूनी जामा पहनाया जाए
भारत ही नहीं दुनिया भर में महिलाओं को परिवार में द्वितीय श्रेणी का नागरिक समझा जाता है. भारत में अभी भी महिलाओं को आर्थिक आजादी नहीं के बराबर है. पैतृक संपत्ति में भी बहुत मुश्किल से उन्हें अपना हिस्सा हासिल हो पाता है. पुरुषवादी मानसिकता एक स्त्री को अपने जूते के नोक पर ही रखता है. ऐसी दशा में कैसे यह सोचा जा सकता है कि एक पुरुष अपनी पत्नी के साथ बिस्तर पर बराबर का व्यवहार करेगा. इसलिए जरूरी है कि मैरिटल रेप पर भारत में कानून बनाने की बात फिर से छेड़ी जाए.
इसी मामले में फैसला सुनाते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास के बयान पर गौर करना चाहिए. व्यास कहते हैं कि अगर पत्नी की उम्र 15 साल या उससे अधिक है, तो पति का अपनी पत्नी के साथ यौन संबंध बनाना बलात्कार नहीं माना जाएगा. ऐसे में अप्राकृतिक कृत्य के लिए पत्नी की सहमति नहीं मिलना भी महत्वहीन हो जाता है. सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता करुणा नंदी ने इस मामले में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखती हैं कि न्यायाधीश कानून से बंधे थे. नए भारतीय न्याय संहिता में मैरिटल रेप अपवाद के तहत, अगर पति अपनी पत्नी की सहमति के बगैर उसके शरीर के किसी भी अंग में कोई वस्तु या अंग डालता है, तो इसे बलात्कार नहीं माना जाएगा. नए भारतीय न्याय संहिता में इसे बदला जा सकता था, लेकिन इसे वैसे ही रहने दिया गया. हमने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है ताकि इस मैरिटल रेप अपवाद को हटाया जा सके.
अप्राकृतिक यौन संबंधों को और स्पष्ट करने की ज़रूरत है
भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 63 एक पुरुष बलात्कार करता है यदि वह

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