
नाम और निशान को लेकर नहीं थम रही तकरार, दिल्ली HC पहुंचे शिवसेना के दोनों गुट
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शिवसेना के उद्धव ठाकरे गुट ने दिल्ली हाई कोर्ट में अर्जी दाखिल कर निर्वाचन आयोग के आठ अक्तूबर को दिए आदेश और की गई कार्रवाई पर आपत्ति जताई है. जोर देकर कहा गया है कि उनके राजनीतिक अधिकारों का हनन किया गया है.
महाराष्ट्र की सियासत में उद्धव बनाम एकनाथ शिंदे की सियासी लड़ाई खत्म होने के बजाय और ज्यादा तल्ख होती जा रही है. अब शिवसेना के उद्धव ठाकरे गुट ने दिल्ली हाई कोर्ट में अर्जी दाखिल कर निर्वाचन आयोग के आठ अक्तूबर को दिए आदेश और की गई कार्रवाई पर आपत्ति जताई है. शिवसेना के ठाकरे धड़े ने कहा है कि जबसे आयोग ने उसके नाम, निशान और झंडे पर एकतरफा रोक लगाई है, पार्टी की गतिविधियां जड़ हो गई हैं. क्योंकि आयोग ने पार्टी के लोकतांत्रिक अधिकारों पर मनमाना कुठाराघात किया है.
अर्जी पर सुनवाई के दौरान ठाकरे गुट के वकील कपिल सिब्बल और देवराज कामत ने पक्ष रखा. सिब्बल ने कहा कि निर्वाचन आयोग ने बिना हमें सुने एकतरफा रोक लगा दी है. ये किसी भी राजनीतिक दल के अधिकारों का हनन है. ये अधिकार जन प्रतिनिधित्व कानून 1951 और सिंबल एक्ट के तहत मिला हुआ है.
कामत और सिब्बल ने हाई कोर्ट में कहा कि वो आयोग को आदेश दे कि आयोग या तो हमारा पक्ष सुने या अपना आदेश वापस ले. कामत ने कहा कि उनका परिवार तीस सालों से इस राजनीतिक दल का नेतृत्व करता रहा है. लेकिन अब पार्टी को फ्रीज कर दिया गया है. इन करोड़ों समर्थकों को निराश किया जा रहा है. हम अपने पिता का नाम भी इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं. हमारे 40 विधायक जो पार्टी छोड़कर गए हैं, उनके खिलाफ अयोग्यता का मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है.
एकनाथ शिंदे गुट की ओर से नीरज किशन कौल ने दलील दी कि ठाकरे गुट ने जो यहां कहा है वही सब सुप्रीम कोर्ट में भी कह चुके हैं. निर्वाचन आयोग ने उनको मौका दिया था लेकिन उनकी दिलचस्पी सुप्रीम कोर्ट जाने में थी. उन्होंने आयोग के सामने अपनी बात रखी ही नहीं. हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों की शुरुआती दलील सुनकर लिखित दलील देने को कहा. अब कोर्ट 15 नवंबर यानी मंगलवार को इस मामले में सुनवाई करेगा.

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