
दीवारों से झांकती राइफल की नाल, तांगों का चक्रव्यूह... बाहुबली अनंत सिंह की हिस्ट्री में घनघोर फिल्मी मसाला है!
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अनंत सिंह के यहां तांगा चलाने की शर्त ये थी कि उन्हें रात को अनंत सिंह के घर के पास ही रहना होगा. रात को इन 100 तांगों को N आकार में अनंत सिंह के घर से आधा किलोमीटर की दूरी पर खड़ा कर दिया जाता था. इसके बाद घोड़े बांध दिये जाते थे. फिर रात को इस रेंज में आने वाले हर व्यक्ति पर अनंत सिंह के लोगों की नजर होती थी.
बिहार के मोकामा का लदमा गांव. यहां एक दबंग और बहुत शक्तिशाली व्यक्ति का कच्चा मकान था. मकान मालिक का नाम था अनंत सिंह. वही अनंत सिंह जिन्हें बिहार में 'छोटे सरकार' का विशेषण प्राप्त है. इस मकान की दीवारों में कई छोटे-छोटे छेद थे. रात के अंधेरे में दीवारों की इन छेद से राइफल की नालें निकली रहती थीं. हर पांच-सात मिनट में इन छेद से टॉर्च की रोशनी मारी जाती थी. राइफल की नालें और टॉर्च की रोशनी एक साथ चमकती थीं. अगर टॉर्च की रोशनी में नजर आने वाला शख्स पहचाना होता तो ठीक. अन्यथा नहीं पहचान में आने वाले शख्स को गोली मारने का आदेश था.
ये कहानी बिहार के वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेश्वर ने बताई है. 1998-99 के लोकसभा चुनाव के दौरान कवरेज पर निकले ज्ञानेश्वर सिंह पत्रकारों के साथ अनंत सिंह के घर पहुंचे थे. इस दौरान टाल क्षेत्र के चर्चित CPM (चावल प्याज और मटन) भोज के दौरान अनंत सिंह की जिंदगी की किताब के कई पन्ने उलटे गए.
वही अनंत सिंह जिनके समर्थकों और इलाके के ही सोनू-मोनू गैंग के बीच 60-70 राउंड फायरिंग हुई.
इस फायरिंग के बाद अनंत सिंह ने एक्स पर पोस्ट किया- 'जिनके साथ हो महाकाल, काल उसका क्या बिगाड़े काल?.'
पटना से कुछ ही दूर हुए फायरिंग ने बिहार के लोगों को 90 के दशक की याद दिला दी है जब बिहार में जातीय गैंगवार और फायरिंग की घटनाएं आम थीं.
दरअसल राजपूतों और भूमिहारों के बीच खूनी जंग का इतिहास रहे बाढ़ में लोग रात में घरों से निकलने से भी डरते थे. इस इलाके में अनंत सिंह भूमिहार समुदाय के रक्षक के रूप में उभरे थे.

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