
तीन साल में कैसे बदल गया सीन, BJP ने पशुपति पर क्यों दी चिराग पासवान को तवज्जो?
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बिहार में सीट शेयरिंग का जो संभावित फॉर्मूला सामने आया है, उसमें चिराग पासवान चाचा पशुपति पारस पर भारी पड़ते नजर आ रहे हैं. एलजेपी में टूट के बाद तीन साल में सीन कैसे बदल गया?
भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में बिहार की 40 लोकसभा सीटों को लेकर संभावित फॉर्मूला सामने आया है. चिराग पासवान के नेतृत्व वाली लोक जनशक्ति पार्टी रामविलास (एलजेपीआर) को पांच सीटें मिलने की बात सामने आ रही है. चिराग को हाजीपुर सीट मिलना भी तय बताया जा रहा है. चिराग के चाचा पशुपति पारस की पार्टी राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी (आरएलजेपी) सीट शेयरिंग में खाली हाथ नजर आ रही है. पशुपति को राज्यपाल और उनकी ही पार्टी के सांसद पासवान परिवार के ही प्रिंस राज को बिहार सरकार में मंत्री बनाए जाने की बातें भी सामने आ रही हैं.
एलजेपी में टूट के बाद बीजेपी को जिन पशुपति पारस से दलित वोट की उम्मीद नजर आ रही थी, करीब तीन साल में ही ऐसा क्या हो गया कि वह अचानक ही हाशिए पर चले गए? 2021 में एलजेपी की टूट के बाद साइडलाइन चल रहे चिराग एकाएक कैसे इतने पावरफुल हो गए और उन्हें इतनी तवज्जो दिए जाने के पीछे क्या कारण हैं? बिहार में बीजेपी ने पशुपति पारस पर चिराग को ज्यादा तवज्जो दी है तो उसके भी अपने आधार हैं.
बिहार के वरिष्ठ पत्रकार ओमप्रकाश अश्क ने कहा कि चिराग बीजेपी की ताकत बीजेपी 2019 के लोकसभा और 2020 के बिहार चुनाव में देख चुकी है.2019 में एलजेपी के अध्यक्ष भले ही रामविलास पासवान थे लेकिन सारा कामकाज चिराग ही कर रहे थे. चिराग के नेतृत्व में ही पशुपति नेता बने. पासवान वोटर्स के साथ ही रामविलास के साथ जुड़े लोग उनका बेटा होने के कारण चिराग को उनकी विरासत का नैसर्गिक उत्तारधिकारी मानते हैं. एलजेपी में टूट के बाद चिराग को लेकर एलजेपी के कोर वोटर्स में सहानुभूति भी है और इसके ठीक उलट पशुपति पारस की इमेज डेंट हुई है.
उन्होंने कहा कि हाजीपुर में जनप्रतिनिधि होने के कारण भले ही पशुपति का वोटर्स से जुड़ाव रहा हो, इस सीट की सीमा के बाहर वह अपने आपको विकल्प के रूप में पेश करने में विफल रहे हैं. बिहार बीजेपी के नेता भी यह समझ रहे हैं कि जमीन पर पासवान वोटर्स का बड़ा तबका चिराग के ही साथ है. अब चिराग को ज्यादा तवज्जो देकर बीजेपी ने पशुपति पारस को साइडलाइन कर ही दिया है, नीतीश कुमार को भी सख्त संदेश दे दिया है.
इसे नीतीश के लिए सख्त संदेश इसलिए भी बताया जा रहा है क्योंकि नीतीश के अड़ियल रुख की वजह से ही एक समय चिराग एनडीए में हाशिए पर चले गए थे. दरअसल, नीतीश कुमार की पार्टी 2020 के चुनाव में 43 सीटें ही जीत सकी और आरजेडी, बीजेपी के बाद तीसरे स्थान पर रही. चुनाव नतीजे आने के बाद नीतीश कुमार ने चिराग पर हमला बोलते हुए खुद यह कहा था कि करीब दो दर्जन सीटों पर एलजेपी की वजह से जेडीयू को मात मिली है.
वजह चाहे जो भी हो लेकिन बिहार चुनाव में एलजेपी एक ही सीट जीत सकी लेकिन चिराग ने अपनी ताकत दिखा दी थी. 2019 के चुनाव में बीजेपी के बराबर सीटों की मांग पर अड़ी जेडीयू इस बार एक ही सही, बीजेपी से कम सीटों पर लड़ने के लिए अगर तैयार हो रही है तो इसे नीतीश कुमार की घटी बारगेन पावर से जोड़कर ही देखा जा रहा है. जेडीयू भले ही विपक्षी गठबंधन को झटका देकर एनडीए में वापस आ गई है लेकिन नीतीश को लेकर चिराग के तेवर नहीं बदले हैं.

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