
'जीने के लिए 3-6 से महीने थे...', कैंसर ट्रीटमेंट के दौर को याद कर भावुक हुए युवराज सिंह
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भारत के दिग्गज ऑलराउंडर युवराज सिंह ने मैदान पर बल्ले और गेंद से धमाकेदार प्रदर्शन किया. साथ ही वो कैंसर को भी मात देने में कामयाब रहे. युवराज सिंह ने साल 2019 में क्रिकेट के सभी फॉर्मेट से संन्यास लेने का ऐलान किया था.
युवराज सिंह का शुमार भारतीय क्रिकेट के बेहतरीन ऑलराउंडर्स में होता है. युवराज टी20 विश्व कप 2007 और क्रिकेट वर्ल्ड कप 2011 में भारत की खिताबी जीत के अहम किरदार रहे थे. 2011 के वर्ल्ड कप में तो युवी 'प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट' रहे थे. 2011 की वर्ल्ड कप जीत के बाद माना जा रहा था कि युवराज का करियर अब सबसे स्थिर और सुनहरा दौर देखेगा, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था.
वर्ल्ड कप जीत के कुछ ही महीनों बाद युवराज सिंह को कैंसर होने का पता चला था. 2011 के आखिर में डॉक्टरों ने उनके शरीर में घातक ट्यूमर पाए जाने की पुष्टि की, जिसके बाद वह अचानक जिंदगी और मौत की लड़ाई में उतर गए.
यह बीमारी उस वक्त पकड़ में नहीं आई थी, जब युवराज सिंह वर्ल्ड कप खेल रहे थे, जबकि टूर्नामेंट के दौरान वह लगातार थकान, मतली और शरीर में दर्द से जूझ रहे थे. बीमारी का पता चलने के बाद डॉक्टरों ने उन्हें बताया कि उनके पास सिर्फ 3 से 6 महीने का समय बचा है. अब युवराज सिंह ने अपनी जिंदगी के सबसे अंधेरे दौर को याद करते हुए कैंसर से जंग की दर्दनाक कहानी साझा की है.
डॉक्टर्स ने दी थी युवराज को ये चेतावनी युवराज सिंह ने ‘द स्विच’ शो में केविन पीटरसन से बातचीत के दौरान कहा, 'जब डॉक्टर कहते हैं कि आपके पास सिर्फ तीन से छह महीने हैं, तो सबसे पहला ख्याल यही आता है कि अब मौत करीब है. ट्यूमर मेरे फेफड़े और दिल के बीच था और नसों पर दबाव डाल रहा था. डॉक्टरों ने कहा था कि अगर कीमोथेरेपी नहीं कराई, तो हार्ट अटैक भी हो सकता है.'
युवराज ने बताया कि वह उस समय ऑस्ट्रेलिया दौरे पर टेस्ट टीम का हिस्सा बनने को लेकर काफी उत्साहित थे क्योंकि लंबे इंतजार के बाद उन्हें टेस्ट टीम में अपनी जगह पक्की करनी की उम्मीद जगी थी. उन्होंने कहा, 'मैं सात साल बाद टेस्ट क्रिकेट में अपनी जगह बना पाया था. करीब 40 टेस्ट मैचों में 12वें खिलाड़ी के तौर पर बैठा रहा. मैं खेलना चाहता था, लेकिन हालात ऐसे बने कि इलाज के लिए अमेरिका जाना ही पड़ा.'
2011-12 के दौरान युवराज ने अमेरिका में कीमोथेरेपी करवाई, जो शारीरिक और मानसिक रूप से बेहद कठिन दौर था. इस मुश्किल वक्त में उन्हें कैंसर विशेषज्ञ डॉ. लॉरेंस आइनहॉर्न के शब्दों ने हिम्मत दिया. युवराज ने बताया, 'डॉ. आइनहॉर्न ने मुझसे कहा था कि तुम यहां से ऐसे बाहर निकलोगे, जैसे तुम्हें कभी कैंसर हुआ ही नहीं. इन शब्दों ने मुझे नई ताकत दी. जब डॉक्टरों ने बताया कि मैं दोबारा क्रिकेट खेल सकता हूं, तो लगा जैसे मुझे दूसरी जिदगी मिल गई हो.'

टेस्ट क्रिकेट में मौजूदा दौर के सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज की बहस को भावनाओं से हटाकर आंकड़ों की कसौटी पर परखा गया. इसके लिए पिछले 2 साल में खेले गए सभी टेस्ट मैचों को आधार बनाया गया. इस अवधि में जो रूट ने रनों की निरंतरता और उन्हें बड़े स्कोर में बदलने की क्षमता- दोनों में बाकी बल्लेबाजों से साफ बढ़त बनाई.












