
जब डॉ. हेडगेवार को बताए बिना उन्हें बना दिया गया RSS का ‘सरसंघचालक’
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डॉ. हेडगेवार को संघ की पूरी व्यवस्था खड़ी करने का श्रेय जाता है. मगर इसके शीर्ष पद के लिए सबसे पहला व्यक्ति बनने की उनकी कहानी बेहद दिलचस्प है. इसके लिए उनसे ना पूछा गया था, ना बताया गया. संघ के 100 साल के सफर को याद करती 100 कहानियों की कड़ी में, आज कहानी डॉक्टर हेडगेवार की.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख के पद का नाम होता है ‘सरसंघचालक’. संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ही इसके पहले सरसंघचालक बने. उनके बाद क्रमशः गुरु गोलवलकर, मधुकर दत्तात्रेय देवरस, रज्जू भैया, प्रो. सुदर्शन और वर्तमान में मोहन भागवत सरसंघचालक हैं. हालांकि कुछ समय के लिए लक्ष्मण वासुदेव परांजये को भी ये जिम्मेदारी दी गई थी.
आमतौर पर संघ में दूसरा बड़ा पद सरकार्यवाह (महासचिव) का माना जाता है और इसपर नियुक्ति के लिए हर तीन साल बाद बाकायदा चुनाव होता है. वर्तमान में दत्रात्रेय होसबाले इस पद पर हैं. लेकिन सरसंघचालक को लेकर ये परम्परा रही है कि वरिष्ठ अधिकारियों की सलाह आदि को ध्यान में रखते हुए, सरसंघचालक ही अपने उत्तराधिकारी को चुनते आए हैं. संघ के पहले सरसंघचालक का चुनाव जब हुआ तब तो ना उनसे चर्चा की गई, ना उनको पहले से बताया गया और ना ही उनसे पूछा गया. बल्कि संघ के वरिष्ठ अधिकारियों ने आपस में मंत्रणा करके खुद ही उनके नाम का ऐलान कर दिया था.
जब 'सरसंघचालक' के रूप में अपना नाम सुनकर चौंक गए डॉक्टर हेडगेवार संघ की स्थापना 1925 में ही विजयदशमी के दिन हो गई थी. लेकिन अगले चार साल तक सरसंघचालक जैसा कोई पद अस्तित्व में नहीं आया था. डॉ हेडगेवार की जीवनी लिखने वाले नाना पालकर ने इस सम्बंध में लिखा है कि अक्टूबर 1929 के महीने में संघ में एक बड़ी सभा की तैयारी, नागपुर में करवाने की चर्चा चल रही थी. फिर डॉ. हेडगेवार को लगा कि निष्ठावान, संकल्पित कार्यकर्ताओं की बैठक ज्यादा जरूरी है. सो उन्होंने 19 अक्तूबर 1929 को सभी प्रदेशों के संघचालकों को पत्र भेजकर उनसे 9, 10 नवंबर को बैठक के लिए नागपुर आने का अनुरोध किया. उनको ये भी लिखा कि जो हमारे उद्देश्य के लिए संकल्पित हैं, वो भी आ सकते हैं.
जब सारे प्रचारक, संघ चालक और वरिष्ठ अधिकारी, स्वयंसेवक पहले दिन एक जगह इकट्ठा हुए तो महसूस हुआ कि एक प्रशासनिक व्यवस्था की भी जरूरत है, और उसकी अगुवाई के लिए एक मुखिया की भी जरुरत है. दिलचस्प ये था कि इन चर्चाओं से डॉ. हेडगेवार को दूर रखा गया. विश्वनाथ राव केलकर, बालाजी हुद्दार, अप्पाजी जोशी, कृष्णाराव मोहरिर, तात्याजी कालिकर, बापूराव मुथाल, बाबा साहेब कोल्टे और मार्तंड राव जोग आदि संघ के वरिष्ठ अधिकारियों ने इस चर्चा में भाग लिया.
अगले दिन इन सबके साथ नागपुर के स्वयंसेवकों का एक संयुक्त कार्यक्रम हुआ, इसके लिए जगह चुनी गई मोहिते का बाड़ा. ये जगह संघ के इतिहास में दूसरी बार शामिल होने जा रही थी क्योंकि डॉ हेडगेवार ने संघ की पहली शाखा भी यहीं शुरू की थी.
जिस समय डॉ हेडगेवार भगवा ध्वज के पास खड़े थे, सभी लोग प्रवेश द्वार के पास खड़े थे, अचानक वर्धा के संघचालक अप्पा जी जोशी ने तेज आवाज में कहा सरसंघचालक प्रणाम एक.. दो.. तीन. इस तरह का प्रणाम संघ में आमतौर पर भगवा ध्वज को किया जाता है, जिसे स्वयंसेवक अपना गुरु मानते हैं. एक कहते ही सबने अपने सीने पर दाहिने हाथ को इस तरह से रखा कि केवल अंगूठा सीने लगा हो और हथेलियां जमीन की तरफ हों. दो कहते ही सर झुक गए और तीन कहते ही सामान्य स्थिति में आ गए. डॉ. हेडगेवार अवाक खड़े थे. इधर अप्पाजी जोशी ने कल हुई बैठक में लिए गए निर्णयों की जानकारी सभी को दी कि कैसे संघ की प्रशासनिक व्यवस्था खड़ी की जा रही है, जिसके शीर्ष पर सरसंघचालक होगा, पहले सरसंघचालक के तौर पर डॉक्टर हेडगेवार को चुना गया है.

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