
'ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना' पर तत्काल लगे रोक, कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने पर्यावरण मंत्री को लिखा पत्र
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अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में इस प्रोजेक्ट को लागू किया जाना है. इस प्रोजेक्ट के जरिए एक ऐसी जगह विकसित करने की योजना है जहां दुनियाभर के जहाज पहुंच सकें. सामान आयात-निर्यात किया जा सके.
ग्रेट निकोबार द्वीप में 'मेगा इन्फ्रा प्रोजेक्ट' को प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक गंभीर खतरा बताते हुए कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने पर्यावरण मंत्री भूपेन्द्र यादव को एक पत्र लिखा है. उन्होंने कहा कि इस परियोजना को दी गई सभी मंजूरी को तत्काल सस्पेंड किया जाए और संसदीय समिति द्वारा इसकी गहन और निष्पक्ष समीक्षा करने के बाद ही इसे लागू किया जाए.
क्या बोले जयराम रमेश अपने पत्र में पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने कहा कि पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को अपना धर्म निभाना चाहिए. रमेश ने कहा, 'ग्रेट निकोबार द्वीप में केंद्र सरकार का प्रस्तावित 72,000 करोड़ रुपये का 'मेगा इंफ्रा प्रोजेक्ट' ग्रेट निकोबार द्वीप के आदिवासी समुदायों और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक गंभीर खतरा है.' उन्होंने दावा किया कि इस परियोजना के विनाशकारी पारिस्थितिक और मानवीय परिणाम हो सकते हैं. इसे उचित प्रक्रिया का उल्लंघन करके और जनजातीय समुदायों की रक्षा करने वाले कानूनी और संवैधानिक प्रावधानों को दरकिनार करके आगे बढ़ाया गया है.
उन्होंने कहा कि इस परियोजना स्थल के कुछ हिस्से कथित तौर पर सीआरजेड 1ए (कछुए के घोंसले वाले स्थान, मैंग्रोव, मूंगा चट्टान वाले क्षेत्र) के अंतर्गत आते हैं. इस बंदरगाह में निर्माण करने पर रोक है. उन्होंने दावा किया कि इस परियोजना से शोम्पेन जनजाति पर बुरा असर पड़ेगा.
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क्या है ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट? अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में इस प्रोजेक्ट को लागू किया जाना है. इस प्रोजेक्ट के जरिए एक ऐसी जगह विकसित करने की योजना है जहां दुनियाभर के जहाज पहुंच सकें. सामान आयात-निर्यात किया जा सके. बड़ा पावर प्लांट लगाने के साथ तमाम व्यवस्थाएं की जानी हैं. लेकिन इसका जमकर विरोध हो रहा है. केंद्र का तर्क है कि इस प्रोजेक्ट से पर्यटन, व्यापार और इंफ्रास्ट्रक्चर तीनों को मजबूती मिलेगी.
लेकिन प्रोजेक्ट का विरोध कर रहे लोगों का कहना है कि इतनी उथल-पुथल के कारण यहां रहने वाले आदिवासी समुदायों के रहने का तरीका बदलेगा. उनका जनजीवन प्रभावित होगा.उनके अधिकार छिन जाएंगे. 130 वर्ग किलोमीटर का जंगल खत्म हो सकता है. तर्क है कि प्रोजेक्ट का सबसे ज्यादा असर यहां के संवेदनशील आदिवासी समूह पर भी पड़ेगा, जो बाहरी की दुनिया से कटे रहते हैं. वहीं शोमपेन जनजाति और उनके जीवन पर भी बुरा असर पड़ेगा.

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